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________________ 84 रयणप्पहनयरीए अन्नाई वि संति अंतरपुराई । देवगइअणुगयाइं भवणाहिववणयराण ति ॥ १५०॥ तीए जओ बाहल्लं जोयणलक्खं असीइसहसजुयं । हेट्टोवरिमसहस्सं एक्केकं पुण तहिँ मोत्तुं ॥ १५१ ॥ भवणाहिवइसुराणं अणेगभेयाइ संति भवणाई | पढमसहस्से हेट्ठिम-उवरिमगसयाइ दो मुत्तुं ॥१५२॥ मज्झिमसु य अट्टसु सएसु वणयरसुराण रम्माई । तो साइं नयराई चिट्ठेति अणेगरूवाई ॥१५३॥ एएस य सव्वेसु वि होंति पओलिउ तिन्नि तिन्नेव । नवरं तइया देवाणुपुव्विनाम त्ति नायव्वा ॥ १५४॥ तीए य पवेसो च्चिय मणुस्स- तिरियाणुपुव्वियाहिं पुणो । निय - निय-गईसु वच्चंतयाण निक्कासणं चेव ॥ १५५ ॥ भवणवइ-वणयराण आउयचिंता सुराउपालेण । दोह वि जहन्नओ दसवाससहस्साइं विहियाई ॥ १५६ ॥ उक्कोसेण उ भवणाहिवाण उत्तरदिसाए मेरुस्स । बलि नाम सुरिंदो जो सागरमहियं ठिई तस्स ॥१५७॥ दाहिणदिसाए चमरो जो तस्स उ सागरोवमं एक्क ं । इयरेसिं पुण दाहिणदिसाए पओिवमं सङ्कं ॥ १५८॥ उत्तरदिसिट्ठियाण उ दो देसूणाई हुंति पलियाई । भवणवईणं एवं वंतरदेवाण पुण पलियं ॥ १५९ ॥ जेवि असायप्पमुहा सुहडा निय-निय-पिऊण वयणेण । पत्ता साहज्जकए नरयाउयपालदेवस्स ॥ १६०॥ तेवि नियसत्तिसरिसं नारयगइ-लोय - भेसणट्टाए । पवियंभिउमाढत्ता निक्करुणं जह तहा सुणह ॥ १६९ ॥ रयणप्पा - पुरीए मझे भवणवइ नाम पयडेसु । देवगइ - वरपुरी - पडिबद्धेसु पुरेसु केसुं पि ॥ १६२॥ चारित्तमोह - नंदण कसाय- सुहडेहिं विहियपयसेवा । बहुमय मिच्छदंसण- सचिवा परमाहमिय-तियसा ॥ १६३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229663
Book TitleChandappahachariyam ni Rupkatha
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages22
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size444 KB
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