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________________ फेब्रुआरी डांस - मंस परीसहो सही, डांस मसा उडाडइ नही वस्त्र छतइ वस्त्र वांछइ नही, अचेलपरीसो कहीए सही ॥९१॥ अरतिपरीसहो मन उद्वेग, स्त्री देखी आंणें संवेग, चर्यापरीसहें वीहार ज करइ, कष्ट सहें मन धीरज धरइ ॥ ९२॥ सझायभूमि डोलइ नही, नसीयापरीसह एहज सही, रूडो भूडो स्थानक नवि कहे, सेज्यापरीसहो निसदिन सहै ॥९३॥ कडुया वचन अहियासे जेह, अक्रोसपरीसह कही तेह, मारता कुटतां खिमा करइ, वधपरीसहो इणिपरि धरइ ॥९४॥ भीक्षा मांगतां न करे अभिमान, जाचनापरीसो इणिविध जांन, अणलाधे दीनज नवि थाय, अलाभपरीसो ते कहिवाय ॥९५॥ रोग आव्यें उषध नवि करइ, रोगपरीसहो इणिपरि धरइ, डांभ तरणांनो फरसज सहें, तणफासपरिसो इणिविध कहें ॥ ९६ ॥ दीलनो मेंल उतारें नही, मलपरीसो कहीए सही, - २०१२ ११९ आदर देखी न करे अभिमान, सतकारपरीसो एहज जांन ॥ ९७॥ भण्या गुण्यानो गर्व नवि करइ, परीगन्यापरीसहो इणिपरि धरइ, भणतां नावें तव दीन नवि थाय, अनांणपरीसो ए कहिवाय ॥९८॥ समकितथी नवि डोले जेह, समकिंत परीसहो कहीए तेह, क्षांति क्षमा जे क्रोध नवि करइ, आर्जवपणो अभिमान नवि धरइ ॥९९॥ मुत्ती ते लोभनो परिहार, तप छ भेदे कहीयो सार, संजम सत्तर भेदे आंण, सत्य सांचो बोलेवो जांण ॥१००॥ जेणि क्रिया कर्म लागै नही, शौचपणो ते कहीए सही, अकिंचनपणें धन न रखाय, नव वाडि सहीत ब्रह्मचर्य कहिवाय ॥१०१॥ दसविध यतीधर्म कह्यो सार, चालीसमो ए संवरद्वार, बार प्रकारे भावना कही, पांच प्रकारे चारित ग्रही ॥ १०२ ॥ सतावन भेदे संवरद्वार, श्रावक ते धारे निरधार, छ भेदे तप बाह्य ज कयो, छ भेदे अभितर लो ॥१०३॥ बारे भेदे निर्जरा सार, पाले ते उतरें भवपार, अणसण छठ अठमादि करइ, अणोदरी पेट पूरो नवि भरइ ॥ १०४॥
SR No.229622
Book TitleNavtattva Sahitya ane Ek Aprakat Chaupai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuyashchandravijay, Sujaschandravijay
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages21
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size113 KB
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