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________________ ८६ नारी शिर ठवी कुंभ ते सोहासणि लीधा । वाडी बाहिरली आयनें, भलां उछव कीधां ॥५॥ बली बाकुल दीयो देवने, नूंतरियां माटे । सर्वोपसर्गे निवारवा सुखशांतिने साटे ॥ नमण करायो नाथने निज निर्मल काजे । स्नात्र महोत्सव साचवी, आव्या निज दरवाजे ||६|| हिवे विष्णुनृप-नंदने, तेडवाने काजे । शेठ उंमाभाई उंमह्या, सामईयो साजे ॥ फत्ताशाहनी पोलमां, जईये मनरंगे । शाजन जन सहु को मील्यां मन हर्ष उमंगे ॥७॥ हय गय ने वली पालखी, मिलीया छे वृंदे । अश्वगाडी रथनी छबी, अविलोकी आनंदे ॥ भामिनी मंगल गावती, सजी भूषण अंग । वाजित्र विविध प्रकारनां, वाजंत सुचंग ॥८॥ शेठ उमाभाई इंम सजी, आव्या प्रभु आगे । विधिपूर्वक वंदन करी, ललि ललि पाय लागे ॥ विनवे प्रभु आगल रही, उभयो कर जोरी । अहो देवाधिदेवजी, सूणो अरजह अमारी ॥९॥ तुं तिहुंअण जन तारणो, करुणारस दरियो । परम निरंजन जगगुरू, भवि तारी तरीयो ॥ भवजलपोत समान छो, साचा विश्वनां तारू । भव-परिभ्रमण निवारणो प्रभु बिरुद तुमारुं ॥१०॥ शक्र सहस रसना करी, प्रभु तुम गुण गावे । स्तवतां पूरवकोडि लगि, तोहि पार न आवे ॥ तो हुं स्यूं स्तवना करूं, जगबंधु दयाल । मुज अवगुण नवि देखीये, निजबिरूद संभाल ॥ ११ ॥ इम स्तवीने पुन विनवे, वृथा काल निगमीयो । तुम दरिसण विण स्वामी हुं, भववनमां भमीयो ॥ अनुसन्धान-५६
SR No.229608
Book TitleShri Tankshal Madhye Shreyansjin Chaitya Sambandh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages20
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size241 KB
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