SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 3
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ September-2005 65 राजवल्लभ राग ॥ दिनदिन वाधइ दीपतु ए, शांतिकुअर गुणवंत । सकल कला मुखचंदलु रे, त्रिभुवंन मन मोहंत ॥७॥ यौवन पहुता राया तणी रे, परणी कुमरी जाम । राजवल्लभ भय (मय?) दीपतु, मंडलीक थया ताम ॥८॥ राग गुडी ॥ एणी परि राज करंता सीमाढा सवे । सेवक थइ आवी मिल्या ए ॥९॥ सुखीय थया तव लोक, तस्कर परचक्र । उपद्रव तेहना सवि टल्या ए ।। पुरव पुण्यप्रमाण आयुधशालाइ । परदलना मद मोदनु (मोडतु ?) ए ॥ चक्र उपजूं सार उगशेरी दिनकार | सहसकिरण जस छोरनु ए ॥१०॥ राग देशाख ॥ चक्र लेइनि चालिआ तव षटखंड जीत्या(जीत) । चक्रवति थया पांचमा, प्रभु त्रिजग वदीत ॥११॥ वैताढवासी जे नरवलं वलता ते मिलिया । देसा खयरी विद्याधरा ते सवि पाच्छा वलया ॥१२॥ विजय करी घरि आविआ बंदी करइं जइकार । वधावइ वरकामिनी बोलइ मंगल च्यार ॥१३॥ पंच विषय सुख भोगवि सोवनवन तनु चंग । गजपुरि नयरि वसंत केदारो कउ रागउग ॥१४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229564
Book TitleRagmala Shantinath Stavan
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size276 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy