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________________ अनुसन्धान-५४ श्रीहेमचन्द्राचार्यविशेषांक भाग-२ वार-परवइ पूरां लूगड़ां, इक अचिरय जो तुं; ठेपाडइ नहीं काछड़ी, माथइ बांधइ पोतुं. खेड़ि करइ खड़ वाढइ आप, व्यापार अनेरा; जनम मांहि जाणइ नहीं, नित्य कांतइ ढेरा. नामुंअ लेखुंअ नवि लहइ, अख्यर नवि आवइ; वस्तु-वांनुं कांइ लिइ, बइअरि समझावइ. गुरु-भोजिक भेला जिमइ, विण सालणइ भावइ; मरणि-परणि मेडु करी, निज घर लूटावइ. ४० काछीअ माछीअ जेहवा, दीसंता रूपइं; कांइ धसु अह्म ठेलवा, तुम्हे जाण्या सरूपइं. इम गूजर संघ गोरड़ी, जव वदवा लागी; कछमंडन खखराल संघ, नारि कहिवा लागी. ४२ कहु गुज्जरी यात्रिं अचीण१५, मुहि भुछी गाला हो; भोइ भोइ आज्यो विवेग, हेड़ी गालि म काहो. ४३ आंजी पयरि बूझ्यउं असई, निसगारी गालि; माठि करो भुछ्यो म च्यु, च्यु चंगी चालि. आंजे वाति न नीकरइ, लख डीइ च्यंगो; भुक्खड़-भुच्छड़ा जे होइं, उनजो एह बंगो. धुर१७ पाखी१८ आया ११मणुंस, अइं ठल्ला गुज्जर; कोरु करिआं असिं च्याउरि२०, अशां च्यंगी बज्जर. ४६ अंबा-लींब२१ न बुज्झिउं, अशां च्यंगा चिप्भड़; अइं साह्मी२२ नाठी अच्या, कोरो च्यां उप्भड़. ४७ ढाल [३] राग सिंधुओ. बाबीओ ए अदीयां, इयड़ो गुरु हेकड़ो, __आइएसां, इयडो२३ गुरु हेकडो, बाबीओ ए अदीयां, कहो द्यइ अशांशि ठेकड़ो, आइए सां, कहो द्यइ अशांशि ठेकड़ो,
SR No.229558
Book TitleNana Deshdeshi Bhashamay Vijaychintamani Parshwanath Jinstotra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvanchandravijay
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages22
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size135 KB
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