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________________ December 2003 च्यारे चीकणां करम रे, नाणांवरणीअ कर्म कठण जे दंसणां ए ॥७॥ मोहनी नि अंतराय रे, ए पणि खइ करइ तव अरीहा केवल वरइ ए ॥८॥ समोवसर्ण सुर सार रे, रचता रंगस्युं ऋणि वप्रस्य पीठिका ए ||९|| रयण सीघासण च्यार रे, च्यार धजा सही चामर वीजइ च्योहो गमां ए ॥१०॥ भामंडल जिन पूठ्य रे, अशोष तरु सही वीस हजार गढि पगथीआ ए ॥११॥ च्यार पूखरणि वाव्य रे, समोवसरण धरिं अढी कोस ऊंचूं सही ए ॥ १२ ॥ ढाल ॥ एणी परि राय करंता रे ॥ दूहा ॥ वर्धमांन जीन त्यांहा ठवी, करता वचन प्रकास । सकल गुणे करी दीपतो, अतीसहइ चोतीस तास ॥१३॥ त्रु० ॥ ढाल || दइ दइ दरसण आपणूं || राग- गोडी || अतीसहइ चोतीस जीनतणा, प्रथमइ रुप अपार रे । रोग रहीत तन नीरमलुं, चंपकगंध सुसार रे ।। सार चंपक तन सुगंधी भमर भंग त्याहा भइ सास निं उसास सुंदर, कमलगंधो मुख्य रमइ । रुधीर मंश गोखीरधारा, अद्रीष्ट आहार नीहार रे Jain Education International सहइजना ए च्यार अतीसहइ, करमधाति अग्यार रे || १४ | समोवर्ण्य बारइ परषदा, जोयन मांह्य समाय रे । वाणी जोयनगाम्यणी, बुझइ सूर नर राइ रे ॥ १२३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229556
Book TitleMahavir Jin Stavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size270 KB
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