SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 18
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 44 अनुसंधान-२७ मानत नांही सूरज गंगा, उर, श्रीपरमेश्वर चंगा । नांही दंडवरत की बात, पापी च्युगले घाली घात ॥११०॥ दहा ॥ दूरजन कर तन वेवहइ, सन्मुख लेत संताप । गरुड बराबरि किउं होवइ, जोरे भलेरा साप ॥१११॥ ढाल ॥ जेसंगजी साहि हजूर, आवइ वली चढतइ नूरि । एक सीह नइ पाषर घाली, किउं डरइ हिरणीकी फाली ॥११२।। सुभट सुणी रणतूर, किउं झाल्या रहइ तिहां सूर । झूझूइ जिउं सबल झूझार, हुइ तिहां वादविचार ॥११३।। दहा ।। तव गुरु आए साहि पइं, जिहां जूडे वादीवृंद । तिहां गुरु गुंजइ सीह जिउं, वादी-गरुड-गोविंद ॥११४॥ सूरज हम मानइ सही, निसुंणि अरज वडवीर । उदय होवइ जब सूरकु, तब हम पीवइ नीर ॥११५॥ . ढाल || राति जिमइ भरपूर, तो किसई मान्यो इणइ सूर । । गंगाकुं इयु हम ध्यावइ, मल भस्म न पाउ लगावइ ॥११६।। जो भगवती कही पोकारई, तु कइसइ भस्म मल डारइ । भगवंत निरंजन कहीइ, मसकति विण किउं सो लहीइ ॥११७।। उस पावनकुं इयु कीनो, सही भोग तिजी व्रत लीनो । रमइ रामा रंगि जेह, भगवंत कहीइ किउं तेह ॥११८।। वंछइ माल मुलक जे कोई, दंडव्रत करइगा सोइ । सुणी बोल खुसी हूउ भूप, धन धन गुरु तेरा सरूप ॥११९॥ दुसमन जे वसिमसि करता, मुंसाकी दाइं फिरता । ते कीआ जिउं आटामांहि लूंण, तुझ विण समझावइ कुंण ॥१२०॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229401
Book TitleLabhoday Ras Vachna Biji Bhumika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages23
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size441 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy