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________________ फेब्रुआरी २०११ २५ दर्शन पण बधे 'कंइक छे' अवो समान बोध करावतुं हतुं. माटे अमां सम्यक् के असम्यक् ओवा भेद पाडवा सम्भवित न होवाथी दर्शनने पण प्रमाणकोटिनी बहार मूकवामां आव्युं. आम ताकिक अने आगमिक प्रमाणव्यवस्थामां भेद पड्यो.१ ७. व्यञ्जनावग्रह शब्द प्राप्यकारी इन्द्रियना पोताना विषय साथेना प्रारम्भिक संयोगमां रूढ हतो. तार्किको छओ इन्द्रियमा प्रारम्भिक सम्बन्धनी अपेक्षा राखता हता. माटे तेओओ ओ प्रारम्भिक सम्बन्ध (प्राप्यकारीमां संयोग, अप्राप्यकारीमां वैज्ञानिक) माटे अक्षार्थयोग, विषयविषयिसन्निपात व. शब्दो वापरवा पड्या. अने तेथी बे अवग्रहने जुदा पाडवा 'व्यञ्जन' अने 'अर्थ' विशेषणनी२ जरूर न रही. आगमिक व्यवस्था मुजबना अव्यक्त सामान्यना ग्राहक अर्थावग्रहमां बहु-बहुविधादि अमुक भेदोनी संगति नहोती थती. बीजी तरफ 'सामान्यथी अवगृहीत अर्थना (= अर्थावग्रहना विषयभूत अर्थना) विशेषनिर्णय माटे थती विचारणा' अर्बु लक्षण धरावती ईहा अपाय पछी पण थई शके ते माटे अपायने अर्थावग्रह बनाववो जरूरी हतो. तेथी अपायने 'व्यावहारिक अर्थावग्रह' नाम आपी, तेमां बबादि भेदोनी संगति करी, अर्थावग्रहमां भेदोनी संगति अने अपाय पछीनी ईहा ओ बन्ने प्रश्नोनो हल लाववामां आव्यो. आम करवामां प्रथम अर्थावग्रहने आपोआप 'नैश्चयिक' विशेषण लागी गयु. ताकिक व्यवस्थाना प्राथमिक विशेषोना ग्राहक अवग्रहमां तो तमाम भेदो सीधेसीधा घटी शके तेम होवाथी तेमज ईहानी व्याख्या पण 'निर्णीत अर्थना विशेष विशेषोना निर्णय माटे थनारी विचारणा' ओवी करवामां आवी होवाथी; ताकिकोओ अपायने अर्थावग्रह तरीके कल्पवो जरूरी न हतो. माटे तेमां अवग्रह अक ज प्रकारनो रह्यो. १. आ बाबतनी वधु स्पष्टता माटे जुओ प्र.मी.गत दर्शनशब्द परनी पं. सुखलालजीनी टिप्पणी. २. आ विशेषणोना तात्पर्य माटे जुओ पृ. २८ टि. १ ३. वि.भाष्य - गाथा २८३-२८८
SR No.229393
Book TitleHemchandracharya ni Agam vani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages29
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size153 KB
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