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________________ ३६ (१५) आत्महित चिन्ता कुलक नियगुरुपायपसाया नाउं संसारविलसियविवागं । सम्मं विरत्तचित्तो अप्पहियं किंपि चितेमि ॥ १ ॥ कालोच्चिय जिणआणं काउं तन्हालुयस्स मह सययं । हा जिय ! पमायवेरी न देइ धम्मुज्जमं काउं ॥ २ ॥ जइ एयं सामरिंग धम्मे लहिऊण कहवि हारेसि । ता तं पच्छायावा विहलं विलवेसि परलोए ॥ ३ ॥ रागंधी मोहंधी कज्जाकज्जं न याणसि हयास ! | धत्तूर भामिओ इव सव्वं पेच्छसि सुवन्नमहो ॥ ४ ॥ वेरगमग्गलीणं खणमेगं जइ करेमि अप्पाणं । चंचलचित्तेण पुणो विहलिज्जइ ही नियंतस्स ॥ ५ ॥ एक्को चेव दुरंजो नियचरियं जो वियाणई अप्पा । सो ताव रंजियव्वो जइ इच्छसि साहिउं धम्मं ॥ ६ ॥ जइ इच्छसि अप्पसुहं खिन्नोसि दुहाण तो कुण उवायं । मा को वे ववंतो सालीण गवेसणं कुणसु ॥ ७ ॥ जं आसि धम्मबीयं पुव्वभवे वावियं तए जीव ! । तं इह लुणासि संपइ वावियमिहि लुणसि अग्गे ॥ ८ ॥ इय नाऊण अकज्जं दूरे वज्जेसि किं न हु अणज्ज ! | अह कालपासबंद्धो जुत्ताजुत्तं कह मुणेसि ? ॥ ९ ॥ इंदियचोरेहिं अहं मा भवरन्नंमि भणसु जं मुसिओ । जाणिय चोरेहिं तुमं जो गहिओ तस्स किं भणिमो ? ॥ १० ॥ परजणरंजणहेडं भणेसि अन्नं करेसि अवरं च । अनुसन्धान ४४ तत्थवि पयडं कवडं हा ! दीसइ तुज्झ सव्वत्थ ॥ ११ ॥ लहुएवि धम्मकज्जे तइया साहूहिं चोइओ संतो । असमत्थो भणिय ठिओ अहुणा सोएसि किं तम्हा ? ॥ १२ ॥ चिट्ठइ राई, पासइ न कोई, हवउ जह तह वणुट्ठाणं । इय मूढ ! लोयरंजय ! कुणमाणो किं पि न लहेसि ॥ १३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229312
Book TitleStotratmaka tatha Updeshatmaka Chotris Laghu Krutiono Samucchaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size895 KB
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