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________________ ६६ शती) का उवासयाज्झयणं (५४६ गा० ) शौरसेनी प्राकृत में रचे कुछ विशिष्ट ग्रन्थ हैं जिनमें मुनियों और श्रावकों के आचार-विचार का विस्तृत वर्णन है । इसी तरह हरिभद्रसूरि के पंचवत्थुग (१७१४ गा० ), पंचासग (८५० गा० ), सावयपण्णत्ति (४०५ गा० ) और सावयधम्मविहि (१२० गा० ), प्रद्युम्नसूरि की मूलसिद्धि (२५२ गा० ), वीरभद्र (सं. १०७८) की आराहणापडाया (९९० गा० ), देवेन्द्रसूरि की सडदिणकिच्च ( ३४४ गा० ) आदि जैन महाराष्ट्री में रचे गये प्रमुख ग्रन्थ हैं। इनमें मुनि और श्रावकों की दिनचर्या, नियम, उपनियम, दर्शन, प्रायश्चित आदि की व्यवस्था बतायी गई है। इन ग्रन्थों पर अनेक टीकायें भी मिलती हैं। विधिविधान और भक्तिमूलक साहित्य प्राकृत में ऐसा साहित्य भी उपलब्ध होता है जिसमें आचार्यों ने भक्ति. पूजा, प्रतिष्ठा, यज्ञ, मन्त्र, तन्त्र, पर्व, तीर्थ आदि का वर्णन किया गया है कुन्दकुन्द की सिद्धभक्ति ( १२ गा० ) सुदभत्ति, चरितभत्ति (१० गा० ), अणगारभत्ि ( २३ गा० ), आयरियभत्ति (१० गा० ), पंचगुरुभत्ति (७ गा० ), तित्थयरभत्ति (८ गा.) और निब्बाणभत्ति (२७ गा० ) विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। यशोदेवसूरि क पच्चक्खाणसरूव (३२९ गा० ), श्रीचन्द्रसूरि की अणुट्टाणविहि, जिनवल्लभगणि की पडिक्कण समायारी (४० गा० ), देवभद्र की पमसहविहिपयरण (१८८ गा० और जिनप्रभसूरि (वि० सं० १३६३) की विहिमंगगप्पवा (३५७५ गा० ) इस सन्द में उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। धनपाल का ऋषभपंचासिका (५० गा० ), भद्रबाहु क उवसग्गहरस्थोत्त (२०गा० ), नन्दिषेण का अजियसंतिथुयि, देवेन्द्रसूरि क शाश्वतचैत्यास्तव, धर्मघोषसूरि (१४वीं शती) का भवस्तोत्र, किसी अज्ञात कि का निर्वाण काण्ड (२१ गा० ) तथा योगेन्द्रदेव (छठी शती) का निजात्माष्टक प्रसिद्ध स्तोत्र हैं। इन स्तोत्रों में दार्शनिक सिद्धान्तों के साथ ही काव्यात्मक तत्त्व का विशेष ध्यान रखा गया है। रसात्मकता तो है ही । पौराणिक और ऐतिहासिक काव्य साहित्य जैनधर्म में ६३ शलाका महापुरुष हुए हैं जिनका जीवन चरित कवि ने अपनी लेखनी में उतारा है। इन काव्यों का स्रोत आगम साहित्य है । इन प्रबन्ध काव्य की कोटि में रखा जा सकता है। इनमें कवियों ने धर्मोपदेश, कर्मफल अवान्तर कथायें, स्तुति, दर्शन, काव्य और संस्कृति को समाहित किया है साधारणतः ये सभी काव्य शान्तरसानुवर्ती हैं। इनमें महाकाव्य के प्रायः लक्षण घटित होते हैं । लोकतत्त्वों का भी समावेश यहाँ हुआ है। Jain Education International 2010_04 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229244
Book TitleSahityik Avdan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhagchandra Jain
PublisherZ_Bharatiya_Sanskruti_me_Jain_Dharma_ka_Aavdan_002591.pdf
Publication Year1999
Total Pages57
LanguageHindi
ClassificationArticle & Education
File Size809 KB
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