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________________ Vol. III - 1997-2002 तपागच्छ - बृहपौषालिक शाखा ३३९ संदर्भ सूची: १. "बृहद्पौषालिकपट्टावली" संपा. मुनि जिनविजय, विविधगच्छीयपट्टावलीसंग्रह, सिंघीजैनग्रन्थमाला, ग्रन्थांक ५३, मुम्बई १९६१ ई., पृष्ठ २४. २. "बृहद्पौषालिकपट्टावली", वही, पृष्ठ १३-३६, तथा संपा. मुनि कल्याणविजय, पट्टावलीपरागसंग्रह, जालोर १९६६ ई., पृष्ठ १७४-१८१ : एवं मोहनलाल दलीचंद देसाई, जैनगूर्जरकविओ भाग ९, नवीनसंस्करण, संपा. जयन्त कोठारी, मुम्बई १९९७ ई., पृष्ठ ७४-८५. ३. द्रष्टव्य देवेन्द्रसूरिकृत श्राद्धदिनकृत्य को प्रशस्ति श्लोक ९.११ मुनि जिनविजय, पूर्वोक्त, पृष्ठ २३-२४. ४. C. D. Dalal, A Descriptive Catalogue of Palm Leaf Mss in the Jaina Bhandars at Pattan, G.o. S.No. 76, Baroda 1937, p. 354-56. ५. देखें संदर्भक्रमांक २. ६. मुनि जिनविजय, पूर्वोक्त, पृष्ठ २३. ७. जीवनचंद साकरचंद झवेरी, संग्राहक और संशोधक-आनन्दकाव्यमहोदधि, भाग ६, श्री देवचन्द लालभाई पुस्तकोद्धारे, ग्रन्थांक ४३, मुम्बई ई. स., १९१८, "प्रस्तावना," श्री मोहनलाल दलीचन्द देसाई, पृष्ठ १०. ८. हीरालाल रसिकलाल कापड़िया, जैन संस्कृत साहित्यनो इतिहास, भाग २, खंड १, श्री मुक्तिकमल जैनमोहनमाला, ग्रन्थांक ६४, बडोदरा १९६८ ई. स., पृष्ठ ३५६-५७. रत्नाकरसूरि के उपदेश से वि. सं. १३७० । ई.स. १३१४ में स्तम्भतीर्थ में हेमचन्द्रकृत शब्दानुशासन की प्रतिलिपि की गयी। P. Peterson. A Fifth Report of Operation in Search of Sanskrit Mss in the Bombay Circle, April 1892 March 1895, p. 110. १०. Vidhatri Vora, Ed. Catalogue of Gujarati Manuscripts : Muni Shree Punya Vijayji's Collection. L. D. Series No. 71, Ahmedabad 1978 A. D. p. 166. ११. P. Peterson, Ibid, Vol 5, No. 51. १२. !bid., Vol 5, No. 396. १३. वृद्धतपागच्छ । रत्नाकरगच्छ का इसी लेख के साथ स्वतंत्र रूप से विवरण दिया गया है। १४. जिनरत्नसूरि की शिष्य परम्परा का इसी लेख के साथ वर्णन किया गया है। १५. मोहनलाल दलीचंद देसाई, जैनगूर्जरकविओ भाग १, नवीनसंस्करण, संपा., डॉ. जयन्त कोठारी, मुम्बई १९८६ ई. स., पृष्ठ ८५ और आगे. १६. A. P. Shah, Ed. Catalogue of Sanskrit & Prakrit Mss : Muni Shree Punya Vijayji's Collection, Part I, L. D. Series No. 2 Ahmedabad 1963 A. D., No-991, p. 81. १७. मोहनलाल दलीचंद देसाई, जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास, मुम्बई १९३१ ई. स., कंडिका ११९. १८. जैनगूर्जस्कविओ, पूर्वोक्त, भाग १, पृष्ठ ९८-१०१. १९. अम्बालाल प्रेमचन्द शाह, जैनतीर्थसर्वसंग्रह, भाग १, खंड १, अहमदाबाद १९५३ ई. , पृष्ठ ११६-११८. २०. विजयधर्मसूरि, संग्रा. प्राचीनतीर्थमालासंग्रह, भाग १, भावनगर वि. सं. १९७८, पृष्ठ ५६-५७. २१. James Burges, Antiquities of Kathiawad and Kuchh., Reprint Varanasi 1971 A. D., pp. 159-61. २२. जैनसाहित्यनो संक्षिप्त इतिहास, कंडिका ६८१, ६८६. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229107
Book TitleTapagaccha Bruhad Paushalik Shakha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherZ_Nirgrantha_1_022701.pdf and Nirgrantha_2_022702.pdf and Nirgrantha_3_022703.pdf
Publication Year2002
Total Pages17
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size499 KB
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