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________________ २२ प्रमाण की मर्यादा ३५३ अपने को प्रत्यक्षमात्रवादी कहता है; इसका अर्थ इतना ही है कि अनुमान, शब्द श्रादि कोई भी लौकिक प्रमाण क्यों न हो पर उसका प्रामाण्य इन्द्रियप्रत्यक्ष के सिवाय कभी संभव नहीं। अर्थात् इन्द्रिय प्रत्यच से बाधित नहीं ऐसा कोई भी ज्ञानव्यापार अगर प्रमाण कहा जाए तो इसमें चार्वाक को आपत्ति नहीं। २-अनिन्द्रिय के अंतःकरण-मन, चित्त और आत्मा ऐसे तीन अर्थ फलित होते हैं, जिनमें से चित्तरूप अनिन्द्रिय का आधिपत्य माननेवाला अनिन्द्रियाधिपत्य पक्ष है । इस पक्ष में विज्ञानवाद, शून्यवाद और शांकरवेदांत का समावेश है। इस पक्ष के अनुसार यथार्थ ज्ञान का संभव विशुद्ध चित्त के द्वारा ही माना जाता है। यह पक्ष इन्द्रियों की सत्यज्ञानजनन शक्ति का सर्वथा इन्कार करता है और कहता है जि इन्द्रियाँ वास्तविक ज्ञान कराने में पंगु ही नहीं बल्कि धोखेबाज भी अवश्य है। इसके मंतव्य का निष्कर्ष इतना ही है कि चित्त, खासकर ध्यानशुद्धसात्त्विक चित्त से बाधित या उसका संवाद प्राप्त न कर सकनेवाला कोई ज्ञान प्रमाण हो ही नहीं सकता चाहे वह भले ही लोकव्यवहार में प्रमाण रूप से माना जाता हो। ३-उभयाधिपत्य पक्ष वह है जो चार्वाक की तरह इन्द्रियों को ही सब कुछ मानकर इन्द्रिय निरपेक्ष मन का असामर्थ्य स्वीकार नहीं करता और न इन्द्रियों को पंगु या धोखेबाज मानकर केवल अनिन्द्रिय या चित्त का ही सामर्थ्य स्वीकार करता है। यह पक्ष मानता है कि चाहे मन की मदद से ही सही पर इन्द्रियाँ गुणसम्पन्न हो सकती हैं और वास्तविक ज्ञान पैदा कर सकती हैं। इसी तरह यह मानता है कि इन्द्रियों की मदद जहाँ नहीं है वहाँ भी अनिन्द्रिय यथार्थ ज्ञान कर सकता है। इसी से इसे उभयाधिपत्य पक्ष कहा है। इसमें सांख्य-योग, न्यायवैशेषिक, मीमांसक, आदि दर्शनों का समावेश है । सांख्य-योग इन्द्रियों का सादगुण्य मानकर भी अंतःकरण की स्वतंत्र यथार्थ शक्ति मानता है। न्याय-वैशेषिक आदि भी मन की वैसी ही शक्ति मानते हैं पर फर्क यह है कि सांख्ययोग आत्मा का स्वतंत्र प्रमाण सामर्थ्य नहीं मानते क्योंकि वे प्रमाण सामर्थ्य बुद्धि में ही मानकर पुरुष या चेतन को निरतिशय मानते हैं । जब कि न्याय-वैशेषिक चाहे ईश्वर के आस्मा का ही सही पर आत्मा का स्वतंत्र प्रमाणसामर्थ्य मानते हैं । अर्थात् वे शरीर-मन का अभाव होने पर भी ईश्वर में ज्ञानशक्ति मानते हैं। वैभाषिक और सौत्रांतिक भी इसी पक्ष के अंतर्गत है । क्योंकि वे भी इन्द्रिय और मन दोनों का प्रमाणसामर्थ्य मानते है । ४-अागमाधिपत्य पक्ष वह है जो किसी न किसी विषय में आगम के सिवाय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229072
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherZ_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf
Publication Year1957
Total Pages26
LanguageHindi
ClassificationArticle & Logic
File Size2 MB
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