________________ 168 जैन धर्म और दर्शन याई, इच्छामि खमासमणो उब्वडियोमि तुब्भरह, इच्छामि खमासमणो कयाई च मे, पुव्यामेव मिच्छत्तानो पडिक्कम्मइ कित्तिकम्मा-इतने सूत्र मौलिक जान पड़ते है। तथा इनके अलावा 'तत्थ समणोवासो, थूलगपाणाइवायं समणोवासो पन्चक्खाइ, थूलगमुसावायं,' इत्यादि जो सूत्र श्रावक-धर्म-संबन्धी अर्थात् सम्यक्त्व, बारह व्रत और संलेखनाविषयक हैं तथा जिनके आधार पर 'वंदित्तु' की पद्य-बन्ध रचना हुई है, वे सूत्र भी मौलिक जान पड़ते हैं / यद्यपि इन सूत्रों के पहले टीकाकार ने 'सूत्रकार आह, सूत्र' इत्यादि शब्दों का उल्लेख नहीं किया है तथापि 'प्रत्याख्यान-आवश्यक' में नियुक्तिकार ने प्रत्याख्यान का सामान्य स्वरूप दिखाते समय अभिग्रह की विविधता के कारण श्रावक के अनेक मेद बतलाए हैं। जिससे जान पड़ता है। श्रावक-धर्म के उक्त सत्रों को लक्ष्य में रखकर ही नियुक्तिकार ने श्रावक-धर्म की विविधता का वर्णन किया है / आजकल की सामाचारी में जो प्रतिक्रमण की स्थापना की जाती है, वहाँ से लेकर 'नमोऽस्तु वर्धमानाय' की स्तुति पर्यन्त में ही छह 'श्रावश्यक' पूर्ण हो जाते हैं / अतएव यह तो स्पष्ट ही है कि प्रतिक्रमण की स्थापना के पूर्व किए जानेवाले चैत्य-चन्दन का भाग और 'नमोऽस्तु वर्धमानाय' की स्तुति के बाद पढ़े जाने वाले सज्झाय, स्तवन, शान्ति आदि, ये सब छह 'श्रावश्यक' के बहिर्भूत हैं / अतएव उनका मूल 'श्रावश्यक' में न पाया जाना स्वाभाविक ही है / भाषा दृष्टि भाषा के गद्य-पद्य मौलिक हो ही नहीं सकते; क्योंकि सम्पूर्ण मूल 'आवश्यक' प्राकृत भाषा में ही है / प्राकृत-भाषा-मय गद्य-पद्य में से जितने सूत्र उक्त दो उपायों के अनुसार मौलिक बतलाए गए हैं, उनके अलावा अन्य सूत्र को मूल 'श्रावश्यक'-गत मानने का प्रमाण अभी तक हमारे ध्यान में नहीं आया है। अतएव यह समझना चाहिए कि छह 'अावश्यकों में 'सात लाख, अटारह पापस्थान, श्रायरिय-उवज्झाए, वेयावच्चगराण, पुक्खरवरदीवड्ढे, सिद्धाणं बुद्धाणं, सुअदेवया भगवई आदि थुई और 'नमोऽस्तु वर्धमानाय' आदि जो-जो पाठ बोले जाते हैं, वे सब मौलिक नहीं हैं / यद्यपि 'श्रायरियउवझ्झाए, पुक्खखरदीवड्ढ़े, सिद्धाणं बुद्धाणं' ये मौलिक नहीं हैं तथापि वे प्राचीन हैं; क्योंकि उनका उल्लेख करके श्री हरिभद्र सूरि ने स्वयं उनकी व्याख्या की है। प्रस्तुत परीक्षण विधि का यह मतलब नहीं है कि जो सूत्र मौलिक नहीं है, उसका महत्त्व कम है / यहाँ तो सिर्फ इतना ही दिखाना है कि देश, काल और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org