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________________ १५ (तात्पर्य० १. १. ५, १. १. ३६), जयन्त (न्यायम० पृ० ११०) श्रादि पिछले सभी नैयायिकोंने उक्त पाञ्चरूप्यका समर्थन एवं वर्णन किया है तथापि विचारस्वतन्त्र न्यायपरम्परामें वह पाञ्चरूप्य मृतकमुष्टिकी तरह स्थिर नहीं रहा । गदाधर आदि नैयायिकोंने व्याप्ति और पक्षधर्मतारूपसे हेतुके गमकतोपयोगी तीन रूपका हो अवयवादिमें संसूचन किया है। इस तरह पाञ्चरूप्यका प्राथमिक नैयायिकाग्रह शिथिल होकर त्रैरूप्य तक आ गया। उक्त पाञ्चरूप्यके अलावा छठा अज्ञातत्व रूप गिनाकर घड्प हेतु माननेवाली भी कोई परम्परा थी जिसका निर्देश और स्वएडन अर्चट' ने 'नैयायिक-मीमांसकादयः' ऐसा सामान्य कथन करके किया है। न्यायशास्त्रमै ज्ञायमान लिङ्गकी करणताका जो प्राचीन मत (शायमानं लिङ्ग तु करणं न हि-मुक्ता० का०६७) खण्डनीय रूपसे निर्दिष्ट है उसका मूल शायद उसी घड्रूप हेतुवादकी परम्परामें हो। जैन परम्परा हेतुके एकरूपको ही मानती है और वह रूप है अविनाभावनियम । उसका कहना यह नहीं कि हेतुमें जो तीन या पात्र रूपादि माने जाते हैं वे असत् हैं। उसका कहना मात्र इतना ही है कि जब तीन या :पाँच रूप न होने पर भी किन्ही हेतुओंसे निर्विवाद सदनुमान होता है तब अविनामावनियमके सिवाय सकल हेतुसाधारण दूसरा कोई लक्षण सरलतासे बनाया ही नहीं जा सकता। अतएव तीन या पाँच रूप अविनाभावनियमके यथासम्भव प्रपञ्चमात्र है। यद्यपि सिद्धसेनने न्यायावतारमें हेतुको साध्याविनाभावी कहा है फिर भी अविनाभावनियम ही हेतुका एकमात्र रूप है ऐसा समर्थन करनेवाले सम्भवतः सर्वप्रथम पात्रस्वामी हैं। तत्त्वसंग्रहमें शान्तरक्षितने जैनपरम्परासम्मत अविनाभावनियमरूप एक लक्षणका पात्रस्वामीके मन्तव्यरूपसे ही निर्देश करके खएडन किया है । जान पड़ता है पूर्ववर्ती अन्य जैनतार्किकोंने हेतुके स्वरूप १ षडलक्षणो हेतुरित्यपरे नैयायिकमीमांसकादयो मन्यन्ते । कानि पुन: षड्पाणि हेतोस्तैरिष्यन्ते इत्याह...त्रीणि चैतानि पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकाख्याणि, तथा अबाधितविषयत्वं चतुर्थ रूपम्,...तथा विक्षित करख्यत्वं रूपान्तरम्एका संख्या यस्य हेतुद्रव्यस्य तदेकसंख्यं...य ग्रेकसंख्यावच्छिन्नायां प्रतिहेतुरहि तायां हेतुव्यक्तौ हेतुत्व तदा गमकत्वं न तु प्रतिहेतुसहितायामपि द्वित्वसंख्यायुक्तायाम्...तथा ज्ञातत्वं च शानविषयत्वं च, न ह्यज्ञातो हेतुः स्वसत्तामात्रेण गएमको युक्त इति ।'-हेतुवि० टी० पृ० २०५। २. 'अन्यथेत्यादिना पात्रस्वामिमतमाशङ्कत्ते-नान्यथानुपपनत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् । अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् ॥'-तत्वसं० का० १३६४-६६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229035
Book TitleHetu ke Rup
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherZ_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf
Publication Year1957
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Logic
File Size56 KB
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