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________________ जैन आगमों में पृथ्वीकायिक एवं वनस्पतिकायिक आदि जीवों की हिंसा करने में दोष लगने की बात कही गयी है। मृग आदि का शिकार करने और लकड़ियों में आग लगाने आदि की क्रियाओं को पापमूलक कहा गया है। वृक्ष के फल, शाखा, कन्द-मूल आदि को नष्ट करने की क्रिया को हिंसक वृत्ति माना गया है। भगवतीसूत्र में उल्लेख है कि तापस शिव राजर्षि भी अपनी पूजा के लिए हरी वनस्पति, कन्द-मूल, पुष्प आदि के उपयोग के लिए लोकपालों की अनुमति लेते हैं। ग्रन्थ में एक नर्तकी का उदाहरण देकर स्पष्ट किया गया है कि संसार में रहते हुए भी जीव एक दूसरे की स्वतंत्रता हनन एवं हिंसा आदि से बच सकते हैं। जैन आगमों में श्रावकों के लिए जिन पन्द्रह कर्मादानों (आजीविका के कार्यों) का निषेध किया गया है, वे सब पर्यावरण संरक्षण के ही उपाय है। अतः जैन आगमों में जीवन और जीविका दोनों को शुद्ध रखने की बात कही गयी है, जो प्रमुख आधार है पर्यावरण-सतुलन का । धार्मिक ग्रन्थों के विभिन्न सिद्धान्तों का पर्यावरण संरक्षण के साथं तुलनात्मक अध्ययन अब विद्वान करने लगे है। इसके अतिरिक्त श्रावक एवं साधु की सामान्य चर्या भी अनेक प्रकार से पर्यावरण-संरक्षण का ही प्रयत्न है। प्रतिक्रमण, सामयिक, ध्यान ध्वनिप्रदूषण के लिए कवच है। अपरिग्रहवृत्ति प्रकृतिसंरक्षण की आधारशिला है। जीवों के प्रति संवेदना वायु, जल एवं पृथ्वी को सुरक्षित रखने का उपाय है। वन संरक्षण हरितवन की रक्षा के नियम में निहित है। यत्नाचार जैन जीवन-पद्धति का केन्द्र बिन्दु है। यही जतन पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य है। जीवन शुद्धि के साथ जीविका शुद्धि भी आवश्यक है। वनस्पति जीवों की अनेक योनियां आगमों में कही गई हैं । योनिभूत बीज में जीव उत्पन्न होते हैं, इसलिए उनका संरक्षण भी महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि जो जीव मूलरूप में होता है वही पत्र, कोंपल आदि की अवस्था को प्राप्त होता है और वही वृद्धि को प्राप्त करता है। प्राणवान, उच्छवास, आहार आदि को ग्रहण करता है। वे अनन्त लोक में हैं इसलिए भी उन्हें जीव मानकर उनकी रक्षा भी आवश्यक है। वनस्पति का समारंभ करना, कराना तथा करते हुए का अनुमोदन करना अनेक प्रकार के जीवों की हिंसा करता है, इसलिए आगमों में यह कथन किया गया कि जो ऐसा करता है, " तं से अहियाए तं से अवोहीए | वह अहित करता है और अबोधि का कारण माना जाता है इसलिए वनस्पतिकाय जीवों की हिंसा उचित नहीं है। प्रकृति और मनुष्य दोनों पर भावनाओं- क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों का प्रभाव पड़ता है। भगवतीसूत्र में भी वनस्पतिकाय के जीवों के विश्लेषण के प्रसंग में उनकी आहार संज्ञा आदि का विवेचन है। शालि इत्यादि वनस्पतियों में अन्य त्रशजीवों की तरह गति, परिमाण, अवगाहना , कर्म, लेश्या, उत्पत्ति आदि का अस्तित्व बताया गया है। अन्य आगमों में भी वनस्पति और मनुष्य के स्वभाव के साथ तुलना के सन्दर्भ उपलब्ध हैं। आचार्य कुन्दकुन्द ने अनेक उदाहरण वनस्पति जगत् से दिये है। यह सब केवल इसलिए कि मनुष्य यह समझ जाय कि वनस्पति और मनुष्य में कई धरातलों पर समानता है। इसलिए मनुष्य वनस्पति को नष्ट न करें, उसका संरक्षण करें । हिंसा के दुष्परिणाम वनस्पति की रक्षा के लिए जैन आगमों में दूसरा उपाय भी अपनाया गया हैं वह है पापकर्मो का भय प्रदर्शित करना एवं हिंसा के दुष्परिणामों से व्यक्ति को परिचित कराना । भगवतीसूत्र के प्रथम शतक के आठवें उद्देशक में केवल वनस्पति ही नहीं, अपितु पशुजगत, प्राणीजगत, मनुष्यहिंसा, शिकार आदि कार्यो में हिंसा की कौन-कौनसी क्रियाएं लगती है, इसका विवेचन किया गया है। कायिकी, आधिकरणिकी, प्राद्वेषिकी, पारितापतिकी और प्राणातिपातिकी क्रियाओं के अन्तर्गत, मन वचन-काय सभी प्रकार की हिंसा समाहित है, जिससे बचने को कहा गया है। आगम ग्रन्थों में इस प्रकार हिंसा के दुष्परिणामों से परिचित कराकर व्यक्ति के मन में करूणा,अहिंसा, दया आदि के भाव जगाने के पीछे यही उद्देश्य प्रतीत होता है कि व्यक्ति संवेदनशील हो जाय तो यह अपने पर्यावरण को नष्ट करने की बात नहीं सोच सकता। षटकाय के जीवों की हिंसा से विरत रहने के उपदेश के पीछे यही भावना है। हिंसा और तृष्णा से विरक्ति अनासक्ति और संयम से सम्भव है।
SR No.212411
Book TitleAcharang Sutra Ka Vaishishthy
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPremsuman Jain
PublisherPremsuman Jain
Publication Year
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size54 KB
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