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________________ में यज्ञसम्बन्धी प्रतिकात्मक अर्थ बताये हैं । छांदोग्य, बृहदारण्यक२३ आदि उपनिषदों में यज्ञीय विधि एवं यज्ञीय उपकरणों के नामों के प्रतिकात्मक अध्यात्मप्रधान अर्थ बताये गये हैं। यहाँ एक बात कहना अत्यन्त आवश्यक है कि शैलीगत साम्य केवल बहिरंग साम्य होता है । उस पर निर्भर होकर अगर हम उनके अन्तरंग साम्य की अपेक्षा करेंगे तो यह बहुत बडी गलतफहमी होगी । शैलीगत विशेषताएँ कई बार समकालीनता की वजह से भी आ सकती है । आत्मा एवं मोक्षवर्णन की प्रधानता तथा बाह्यशैलीगत साम्य देखकर हम कतई नहीं कह सकते कि, उपनिषदों का जैन तत्त्वज्ञान पर प्रभाव पड़ा है । अत: शोधनिबन्ध के अगले भाग में दोनों में पाये जानेवाले तात्त्विक एवं मूलगामी भेद हम अधोरेखित करेंगे । उपनिषद संज्ञा में अन्तर्भूत 'गूढवाद' : ___ उपनिषद शब्द 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक 'सद्' धातु में 'क्विप्' प्रत्यय लगाकर निष्पन्न हुआ है । शांकरभाष्य में उपनिषद शब्द के तीन भिन्न-भिन्न अर्थ दिये हैं । उनमें से एक अर्थ है, 'रहस्य' अथवा ‘गोपनीय विद्या' । अमरकोश में भी उपनिषद के रहस्य' अर्थ को मान्यता दी है । __ उपनिषदों में निहित गूढवाद ‘कठ' जैसे अनेक उपनिषदों में स्पष्टत: से प्रतिपादित है । * हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।२४ * उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्त्वा त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ।।२५ * तं दुर्दशैं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।२६ * ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।२७ सारांश उपनिषदों की ब्रह्मविद्या गूढवाद के वलय से वेष्टित है । जैन तत्त्वज्ञान बताने की रीति या पद्धति, इससे बिलकुल विपरीत है । समग्र विश्व के विश्लेषण पर आधारित जैन तत्त्वज्ञान सबके लिए खुला है । षड्द्रव्य, realities होने के कारण गूढवाद की कोई गुंजाईश नहीं है । जीवतत्त्व षड्द्रव्यों में से ही एक है । संसार में वह शरीर के आश्रय से रहता है । इस विश्व में अनन्तानन्त जीव हैं । प्रत्येक में चेतनालक्षण जीव का अस्तित्व पाया जाता है । महावीरवाणी नाम से प्रसिद्ध, एक भी आगमग्रन्थ में, इस प्रकार का एक भी वाक्य नहीं पाया जाता कि, 'हे शिष्य ! मैं तुम्हें गूढ रहस्यमय ज्ञान दे रहा हूँ।' उपनिषदों की प्रतिक्रियात्मकता : भारतीय विद्या के सभी अभ्यासक मान्य करते हैं कि आरम्भ में दैवतप्रधान एवं बाद में कर्मकाण्डप्रधान वैदिक साहित्य एवं आचरण की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बाद में आविष्कृत हुई, उसी
SR No.212301
Book TitleUpnishado ka Jain Tattvagyan par Prabhav
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnita Bothra
PublisherAnita Bothra
Publication Year2013
Total Pages19
LanguageMarathi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size164 KB
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