________________ समदर्शी आचार्य हरिभद्र 687 11. कर्मणो भौतिकत्वेन यद्वैतदपि साम्प्रतम् / - वही, 1/4 उत्तरार्ध आत्मनोव्यतिरिक्तं तत् चित्रभावं यतो मतम् / / 29. जत्थ य विसय-कसायच्चागो मग्गो हविज्ज णो अण्णो / शक्तिरूपं तदन्ये तु सूरयः सम्प्रचक्षते / - वही, 1/5 पूर्वार्ध अन्ये तु वासनारूपं विचित्रफलदं मतम् / / 30. सेयम्बरो य आसम्बरो य बद्धो य अहव अण्णो वा / / - शास्त्रवार्तासमुच्चय, 95-96 समभावभावि अप्या लहइ मुक्खं न संदेहो / / 12. समदर्शी आचार्य हरिभद्र, पृ० 53-54 / - वही, 1/3 13. वही, पृ० 55 / 31. नामाइ चउप्पभेओ भणिओ। - वही, 1/5 14. ततश्चेश्वर कर्तृत्त्ववादोऽयं युल्पते परम् / (व्याख्या लेखक की अपनी है / ) सम्यग्न्यायाविरोधेन यथाऽऽहुः शुद्धबुद्धतः।। 32. तक्काइ जोय करणा खोरं पयउं घयं जहा हुज्जा / ईश्वरः परमात्मैव तदुक्तव्रतसेवनात् / / ___ -वही, 1/7 33. भावगयं तं मग्गो तस्स विसुद्धीइ हेउणो भणिया। यतो मुक्तिस्ततस्तस्याः कर्ता स्याद्गुणभावतः / / - वही, 1/11 पूर्वार्द्ध तदनासेवनादेव यत्संसारोऽपि तत्त्वतः / 34. तम्मि य पढमे सुद्दे सब्बाणि तयणसाराणि / - वही, 1/10 तेने तस्यापि कर्तृत्वं कल्प्यानं न दुष्यति / / 35. वही, 1/99-104 - शास्त्रवार्तासमुच्चय, 203-205 36. वही, 1/108 15. परमैश्वर्ययुक्तत्वान्मत: आत्मैव चेश्वरः / 37. वही, 2/10, 13, 32, 33, 34. स च कति निर्दोषः कर्तवादो व्यवस्थितः // 38. वही, 2/34-36, 42, 46, 49-50 2/52, 56-74 वही, 207 88-92 16. प्रकृतिं चापि सत्र्यायात्कर्मप्रकृतिमेव हि / / 39. वही, 2/20 एवं प्रकृतिवादोऽपि विज्ञेयः सत्य एव हि / 40. जह असुइ ठाणंपडिया चंपकमाला न कीरते सीसे / कपिलोक्तत्वतश्चैव दिव्यो हि स महामुनिः / / पासस्थाइठाणे वट्टमाणा इह अपुज्जा / / - वही, 2/22 . वही, 232-237 41. जड चरिउं नो सक्को सद्ध जइलिंग महवपूयट्ठी। 17. अन्ये त्वभिदधत्येवमेतदास्थानिवृत्तये।। तो गिहिलिंग गिण्हे नो लिंगी पूयणारिहओ / / क्षणिक सर्वमेवेति बुद्धनोक्तं न तत्त्वतः / / ___ -वही, 1/275 विज्ञानमात्रमप्येवं ब्राह्यसंगनिवृत्तये / 42. एयारिसाण दुस्सीलयाण साहुपिसायाण मत्ति पूव्वं / विनेयान् कांश्चिदाश्रित्य यद्वा तद्देशनाऽर्हतः / / जे वंदणनमंसाइ कुव्वंति न महापावा ? - वही, 464-465 __-वही, 1/114 18. अन्ये व्याख्यानयन्त्येवं समभावप्रसिद्धये / सुहसीलाओ सच्छंदचारिणो वेरिणो सिवपहस्स / अद्वैतदेशना शास्त्रे निर्दिष्टिा न तु तत्त्वतः / / वही, 550 आणाभट्टाओ बहुजणाओ मा भणह संवृत्ति / / 19. ज्ञानयोगादतो मुक्तिरिति सम्यग् व्यवस्थितम् / देवाइ दव्वभक्खणतप्परा तह उमग्गपक्खकरा / तन्त्रान्तरानुरोधेन गीतं चेत्थं न दोषकृत् // वही, 579 साहु जणाणपओसं कारिणं माभणंह संघं / / 20. यं श्रुत्वा सर्वशास्त्रेषु प्रायस्तत्त्वविनिश्चयः / जहम्म अनीई अणायार सेविणो धम्मनीइं पडिकूला। जायते द्वेषशमनः स्वर्गसिद्धिसुखावहः / / वही, 21. साहुपभिइ चउरो वि बहुया अवि मा भणह संघं / योगदृष्टिसमुच्चय, 87 एवं 88 असंघं संघ जे भणित रागेण अहव दोसेण / 22. शास्त्रवार्तासमुच्चय, 20 छेओ वा मुहत्तं पच्छित्तं जायए तेसिं / / 23. योगदृष्टिसमुच्चय, 86-101 / -वही, 1/119-121, 123 24. वही, 107-109 / 44. गब्भपवेसो वि वरं भद्दवरो नरयवास पासो वि / 25. चित्रा तु देशनैतेषां स्याद् विनेयानुगुण्यतः / मा जिण आणा लोवकरे वसणं नाम संघे वे / / __यस्मादेते महात्मानो भवव्याधिभिषग्वराः॥ - वही,१३४ - वही, 2/132 26. यद्वा तत्तन्नायपेक्षा तत्कालादिनियोगतः / 45. वही, 2/103 ऋषिभ्यो देशना चित्रा तन्मूलैषाऽपि तत्त्वतः / / - वही, 138 46. वही, 2/104 27. मग्गो मग्गो लोए भणंति, सव्वे मग्गणा रहिया / 47. वेसागिहेसु गमणं जहा निसिद्धं सुकुल बहुयाणं / -सम्बोधप्रकरण, 1/4 पूर्वार्ध तह हीणायार जइ जण संग सड्डाण पडिसिद्धं / / 28. परमप्प मग्गणा जत्थ तम्मग्गो मुक्ख मग्गुति / / परं दिट्ठि विसो सप्पो वरं हलाहलं विसं / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org