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________________ दुर्लभ ही प्रतीत होता है। मैं पैदल चलते हुए रेल में सुने गये 'बाउल गान' की एक कड़ी गुनगुनाता जा रहा था- 'एखोनो एलो न कालिया' हृदय में करुणा के भाव जगा रहे थे। एक हूक सी उठती थी। उन स्वरों के आरोह-अवरोह मुझे पूरी तरह अपने में समेटे हुए थे। दूसरी ओर मुझे अपने दिल्ली प्रवास के उन आपाधापी, भागदौड़ और हृदयहीनता से भरे वर्षों की भी याद दिला रहे थे, जिसमें मैं अक्सर 'एखेनो एलो न कालिया' गुनगुनाते हुए काट लिया करता था। मैं अब शांतिनिकेतन परिसर के निकट था। सामने 'मेला माठ' में 'पौषमेला' लगा हुआ था। लोगों में उत्सव का आनंद पूरी तरह दीखता था। 'बाउल गान' के आलाप के साथ-साथ बाउल पूरी मस्ती में एकतारा लिए नृत्यरत थे। पौषमेला शांतिनिकेतन के मुख्य उत्सवों में से है। इसकी परिकल्पना गुरुदेव के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी और उसे विस्तार दिया विश्व कवि ने। इस मेले के आयोजन का उद्देश्य ग्रामीण शिल्प संस्कृति, संगीत, नृत्य आदि को बढ़ावा देने का रहा है। हमारी ग्रामीण संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त न हो जाए, इसका अंदाजा बहुत पहले ही इन मनीषियों ने लगाया था। हालांकि मेले का रूप पहले से बदल-सा गया है, लेकिन पूरी तरह से चेष्टा यह की जाती है कि उसका असली स्वरूप कायम रहे। सुबह से रात के गहराने तक कई दिनों तक संगीत-नृत्य के अलग-अलग कार्यक्रम चलते रहते हैं, जिसमें मैंने देखा कि देश, विदेश से काफी लोग संगीत-नृत्य सुनने-देखने यहां आते हैं। यहां बाउल गान के साथ-साथ पल्लीगीत, कविगान आदि देख सुनकर मैं चकित था। मैंने पहले कहीं भी इतने स्वस्थ उद्देश्यों को लेकर लगाया जाने वाला मेला नहीं देखा था। आश्चर्य इस बात पर होता था कि कहीं इस तरह का भी उत्सव होता है ? जहां जीवंतता, उत्साह और सर्वोत्तम अनुभूतियों के संप्रेषण के लिए खुला परिवेश हो। जबकि दूसरी ओर पूरे विश्व में इतनी बड़ी अफरातफरी और अशांति हो। आतंकवाद और हत्याओं के दौर चल रहे हों। अखबारों में छपने वाली हत्याओं, दुर्घटनाओं की खबरें भी लोगों के रक्त को सर्द ही बनाएं रखती हैं। __ जी हां, शांतिनिकेतन की यात्रा ने हमारे अंदर प्राण का संचार किया और मैं आज की विषमता और विषाक्त परिवेश को भूल सा गया। कई बार उदासी और परेशानी के आलम में यह याद नहीं आता कि पिछली बार हम कब मुस्कुराए, रोए या खुलकर हंस पाये थे तब सिर्फ शांतिनिकेतन के खुले वातावरण की ही याद आती है। ____ मैं इस यात्रा में 'रवीन्द्र भवन' गया था। जहां गुरुदेव के देहावसान के बाद उनके पुत्र रथीन्द्रनाथ ठाकुर ने बड़ी तत्परता और परिश्रम से उनकी पांडुलिपियां, चिट्ठियां और चित्रावली आदि का संकलन किया है। सन् 1942 में संग्रहालय सामान्य जन के लिए खोला गया था, जिसमें गुरुदेव से संबंधित सभी वस्तुएं हैं। यहां से थोड़ी ही दूरी पर एक विशाल 'नाट्य-घर' भी देखा जा सकता है जो अपने आप में एक आश्चर्य ही है। गुरुदेव में अपनी संस्कृति और नाटकों की प्रस्तुति के लिए कैसा जुड़ाव था, यह जानना सच में बड़ी सुखद अनुभूति है। यहां से करीब ही रामकिंकर बैज की बनाई हुई प्रसिद्ध मूर्तियां हैं जो कलाजगत में अपना अन्यतम स्थान रखती हैं। कलाभवन, संगीत-भवन आदि पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। नंदलाल बोस, सुधीर खास्तगीर, के.जी. सुब्रह्मण्यम आदि की कलाकृतियां हमें प्रभावित कर रही थीं। उत्तरायण में मैंने रमणीक बगीचों के अलावा पांच भवन देखे जो अपने आप में शिल्प और भावना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये भवन हैं- उदयन, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च तथा उदीची। बाग में पिछली तरफ जो भवन है उसका नाम है चित्रभानु। पहली मंजिल के 'गुहाघर' में कविवर के पुत्र रथीन्द्रनाथ तथा पतोहू प्रतिमादेवी का स्टुडियो और कला सर्जना के लिए कक्ष है। इस बाग में बहुत मूल्यवान पेड़ हैं, यथा- चंदन, दालचीनी, तेजपात आदि / इसके अतिरिक्त ऐसे कई पेड़-पौधे हैं जिन्हें कोई वनस्पति शास्त्री ही विशिष्टता के साथ बता सकता है। उत्तरायण में ही एक ऐसा भवन भी है, जिसकी सादगी देखते ही बनती है। इसका निर्माण गुरुदेव ने बापू (गांधीजी) के शांतिनिकेतन में आगमन की खुशी में उन्हें ठहराने के लिए करवाया था। अगर आप कभी 'शाल-वीथी' जाएं जहां गुरुदेव शाम को घूमते थे तो अतीव आनन्द की अनुभूति पा सकते हैं, लेकिन शर्त यह है कि शाम ढले हौले-हौले, धीमी गति से बिना किसी पदचाप के अगर आप चलते जाएं तो शायद गुरुदेव की उपस्थिति की अनुभूति अवश्य ही हो सकती है। वहां निश्चय ही ऐसी तरंगे हैं जिसे शुद्ध हृदय और महसूस करने की विशिष्ट शक्ति से समझा जा सकता है। यहां से आम्रकुंज को पार करते हुए उस मंदिर को हम देख सकते हैं, जिसमें कोई देवी, देवता नजर नहीं आते, लेकिन घनी शांति वहां अवश्य ही महसूस की जा सकती है। गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों में शांतिनिकेतन को देखा जा सकता है। उन्होंने अशोक, देवदार और शिरीष के अंतर को जिस जीवंतता से पाठकों को परिचित कराया था, वाकई आश्चर्य की बात है। कुछ देर में मैंने अपने आपको 'हिन्दी भवन' के परिसर में खड़ा पाया। हिन्दी भवन की दीवारों पर बनी विशिष्ट पेटिंग हमारा मन मोहती रही। मेरा हृदय इस अनुभूति से गद्गद् था कि हिन्दी जैसी भाषा को उत्कृष्ट संस्कार तथा संपन्नता देने वाले ऋषितुल्य आचार्य आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इसी हिन्दी भवन के प्रथम अध्यक्ष थे। शांति निकेतन से मैं सीधा 'श्री निकेतन' गया जहां गुरुदेव ने कुटीर उद्योगों की स्थापना की थी। अभी भी वहां कपड़े, बर्तन, खिलौने आदि विशिष्टतम तरीके से बनाना सिखाया जाता है। वे सभी तमाम जगहें आज भी मेरे जेहन में बसी हुई हैं कि एक व्यक्ति ने इतनी बड़ी कल्पना की और उसे साकार कर दिखाया। यह अलग प्रश्न है कि उनके द्वारा स्थापित आश्रम कालांतर में केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने पर भी उन्हीं आदर्शों का पालन कर रहा है? क्या वहां नौकरशाही और घटिया स्वार्थी तत्वों ने अपने जाल नहीं फैलाए हैं ? यह सच है कि यहां अब भी ऐसी तरंगे मौजूद हैं जो कल्याणकारी हैं, लेकिन वे कब तक रहेंगी? मैं वहां से भीगी आंखें और भरा हृदय लेकर रेलगाड़ी में बैठ गया था और हरे-भरे खेतों की ओर देखते हुए गुनगुना रहा था। "एखोनो एलो न कालिया" सह शिक्षक, श्री जैन विद्यालय, हवड़ा हीरक जयन्ती स्मारिका अध्यापक खण्ड /11 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211991
Book TitleShantiniketan Ek Paridarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjay Rai
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Hirak_Jayanti_Granth_012029.pdf
Publication Year1994
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Pilgrimage
File Size404 KB
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