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________________ आदि का कथन जैसी वह है अथवा जसा हमने उसका प्रत्यक्षीकरण (Perceive) किया है, उसी रूप में करते हैं, तब तथ्यात्मक कथन होता है। इसके विपरीत जब हम किसी वस्तु, घटना, विचार अथवा क्रिया आदि की व्याख्या करते हैं तथा अपना अभिमत उसमें समाविष्ट करते हैं तब कथन व्याख्यात्मक कहलाता है । दोनों ही प्रकार के कथन सीमित रूप में ही सत्य का उद्घाटन कर सकते हैं। जिन्हें हम प्रत्यक्षीकृत तथ्य कहते हैं, उनकी सीमा हमारी इन्द्रियां हैं, जिनकी शक्ति को वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से बढ़ाया जा सकता है, परन्तु पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है। हमारी इन्द्रियां वस्तु को एक परिप्रेक्ष्य में अनुभव करती हैं। समग्र रूप से पदार्थ को हस्तामलकवत् तो सर्वज्ञ ही देख सकता है। इस प्रकार हमारा प्रत्यक्ष ज्ञान भी अपूर्ण तथा परिवर्तनशील होता है, तथा अलग-अलग लोगों का प्रत्यक्षीकरण भी भिन्न-भिन्न हो सकता है । प्रत्यक्षीकृत ज्ञान में सामान्यतया एकरूपता पाई जाती है तथा मतभेद के लिए गुंजाइश कम रहती है, परन्तु जब हम तर्क का आश्रय लेकर व्याख्या करने लगते हैं, तो हमारा अभिमत उसमें समाविष्ट हो जाता है । व्याख्या करने वाला किसी संदर्भ अथवा परिप्रेक्ष्य में सम्मति कथन करता है। भाषा की सीमा यह है कि कथन के अनन्त सन्दर्भों को मिलाकर एक साथ नहीं कहा जा सकता। जब हम यह कथन करते हैं कि "देवदत्त यज्ञदत्त का पुत्र है" तो हमारे सामने केवल एक सन्दर्भ रहता है, परन्तु देवदत्त के जो अनेकानेक अन्य सन्दर्भ हो सकते हैं वे अनकहे रह जाते हैं । हमारे जीवन में प्रायः मनोमालिन्य, पारस्परिक कलह तथा वर्ग संघर्ष का मूल कारण अपने विचारों के प्रति अत्याग्रह होता है। हम अन्य व्यक्तियों की बात को उचित संदर्भ में समझे बिना अपनी बात उस पर लादना चाहते हैं । हमारे इस विशाल देश में प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक विभिन्न विचारों, विश्वासों, संस्कृतियों तथा धर्मों को माननेवाले लोग एक साथ रहते आए हैं। भारतीय संस्कृति की इस उदार वृत्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है । हमने लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली को अपनाया है, जिसमें विभिन्न मत रखने वाले समूह तथा व्यक्ति सहिष्णुतापूर्वक एक-दूसरे के अभिमत को समझने का प्रयास करते हैं तथा बहुजनहिताय बहुमत विचार को स्वीकार किया जाता है। सिद्धान्ततः यह बात मान्य होते हुए भी हमारे देश में साम्प्रदायिक मतभेद बढ़े हैं; अपने मत को दूसरों पर आरोपित करके मनवाने का अहंकार बढ़ा है और इसके फलस्वरूप देश की एकता टूट रही है । जैन दर्शन के अनुसार सत्य एकान्तिक न होकर अनेकान्तिक होता है । प्रत्येक व्यक्ति को अपना मत रखने का अधिकार है, परन्तु साथ ही उसे अन्य मतों को उचित संदर्भ में समझने की चेष्टा करनी चाहिए तथा यदि उचित मालूम हो तो अपना मत परिवर्तन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। जीवन के उपयुक्त व्यवहार की प्रासंगिकता आज के भारत के लिए और भी अधिक बढ़ गई है । शोषण मुक्ति तथा अपरिग्रह दूसरों के वैध अधिकार का हनन चोरी कहलाता है। जो व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की विवशता का लाभ उठाकर उनके परिश्रम का प्रतिफल स्वयं चुरा लेता है उसे स्तेन की संज्ञा दी गई है। जैन दर्शन के अनुसार यह चोरी केवल स्थूल ही नहीं अपितु सूक्ष्म भी हो सकती है, अतः मनसा वाचा कर्मणा अस्तेय व्रत तीसरा महाव्रत माना गया है। राज्यांश अथवा कर की चोरी, परीक्षा में नकल, किसी अन्वेषक के अनुसंधान को अपने नाम से प्रकाशित करवाना, किसी कवि अथवा लेखक अथवा रचनाकार की रचना की चोरी करना भी चौर्य-कर्म हैं। स्तेय अथवा शोषण व्यक्ति व्यक्ति के मध्य ही नहीं होता अपितु वर्ग-वर्ग के बीच भी होता है। दलित वर्ग की समस्याएं इसी वर्ग के अन्तर्गत आती हैं। चोरी अथवा शोषण का उद्गम संचय वृत्ति तथा स्वयं परिश्रम न करने की वृत्ति में होता है। जैन मुनि श्रमण कहलाता है क्योंकि वह समाज से अपने पोषण हेतु जितना ग्रहण करता है, उससे कई गुना अधिक श्रम करके समाज को लौटा देता है, और कभी किसी भी वस्तु का सञ्चय नहीं करता । अचौर्य एवं अपरिग्रह दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अस्तेय व्रत का परिपालन अपरिग्रह के बिना संभव नहीं है । जैनागम के अनुसार गृहस्थ का आचरण सर्वथा मुनि जैसा तो नहीं हो सकता, परन्तु मुनि के आचार को आदर्श मानकर उसके अनुरूप आचरण करने का सतत प्रयास रहना चाहिए। श्रावक सर्वथा अपरिग्रही नहीं हो सकता परन्तु उसे परिग्रह की सीमा निर्धारित करनी चाहिए। यह सीमा भोजन-सामग्री, वस्त्र, निवास स्थान, धन तथा सभी उपभोग्य सामग्री के निमित्त बांधी जानी चाहिए। परिवह की मर्यादा अलग-अलग लोगों के मनो विकास के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो सकती है, परन्तु अमर्यादित परिग्रह रखना निषिद्ध है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति तथा योग्यता के अनुसार श्रम करना चाहिए, क्योंकि समाज से जो ग्रहण किया जाए उसे बिना श्रम किए उपभोग करना चौर्य-कर्म है । जैनागम का उक्त व्यवहार-निर्देशक सिद्धान्त आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सबसे अधिक संगत ठहरता है। वर्गसंघर्षको मिटाने का यही आचार्य रत्न श्री देशभूषणजी महाराज अभिनन्दन ग्रन्थ ११४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211974
Book TitleVyavaharik Jain Pratimano ki Adhunik Prasangikta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorL K Oad
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ceremon
File Size748 KB
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