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________________ ६१६ : मुनि श्रीहजारीमल स्मृति-ग्रन्थ : तृतीय अध्याय मध्य एशिया, लघु एशिया, उत्तर पूर्वीय अफरीका के सुमेर, ववीलोनिया, सीरिया, यूनान, अरब, ईरान, मिश्र, यूथोपिया आदि संसार के समस्त प्राचीन देशों में जहाँ भी पणि अथवा फणि और पुरु लोगों के विस्तार के साथ भारत से भगवान् वृषभ की श्रुतियां, सूक्तियां और आख्यान पहुँचे हैं.१ वहां भगवान् अशुर [असुर], ओसोरिस [असुरशि] अहुरमज्द [असुरमहत्], ईस्टर [ईषतर], जहोव [यह्व महान्] गौड [गौर गौड] अल्ला [ईड्य स्तुत्य], I AM [अहमस्मि], सूर्यस् [सूर्य] रवि, मिथ [मित्र] वरुण आदि अनेक लोक-प्रसिद्ध नामों और विशेषणों द्वारा आराध्य देव ग्रहण कर लिये गये. यही कारण है कि इन देशों के प्राचीन आराध्यदेव सम्बन्धी जो रहस्यपूर्ण आख्यान पगम्परागत सुरक्षित हैं, उनमें उपर्युक्त चार वृत्त “I. In Carnation 2. Suffering and Crucification 3. Ressurrection और 4. Ascent to Heaven के नाम से प्रसिद्ध हैं. इस प्रकार उन सूक्तों और मन्त्रों के अतिरिक्त जिनमें स्पष्टतः ऋषभ वृषभ, गौर तथा अनड्वान का उल्लेख है, ऋक्, यजु, साम तीनों ही संहिताओं के प्राय: समस्त छन्द, जिनमें उपर्युक्त संज्ञाओं और विशेषणों से स्तुति की गई है, भगवान् वृषभ की ओर ही संकेत करते हैं. अथर्ववेद के इस तथ्य को व्यक्त करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार आपः (जल), वातः (वायु) और औषधि (वनस्पति)-तीनों एक ही भवन (पृथ्वी) के आश्रित हैं, उसी प्रकार ऋक्, यजु, साम–तीनों प्रकार के छन्दों की कविजन 'पुरस्यं दर्शतं विश्व चक्षणन् [बहुरूप दिखलाई देने वाले एक विश्ववेदस् सहस्राक्ष, सर्वज्ञ को लक्ष्य रखकर ही, वियेतिरे व्याख्या करते हैं].२ ऋग्वेद के निम्नांकित दो मंत्रों में हम भगवान् वृषभदेव के तथोक्त रूपों एवं वृत्तों का वैसा ही इतिहास-क्रमानुसारी वर्णन देख सकते हैं, जैसा कि जैन परम्परा विधान करती है. वे मन्त्र निम्न प्रकार हैं : 3 "दिवस्परि प्रथमं जज्ञ अग्निरूपं द्वितीयं परि जातवेदाः । तृतीयमप्सु नमणा अजस्रमिंधान एवं जाते स्वाधीः ॥" अर्थात् अग्नि प्रजापति पहले देवलोक में प्रकट हुए. द्वितीय बार हमारे बीच जन्मतः ज्ञान-सम्पन्न होकर प्रकट हुए. तीसरा इनका वह स्वाधीन एवं आत्मवान् रूप है, जब इन्होंने भव-सागर में रहते हुए निर्मल वृत्ति से समस्त कर्मेन्धन को जला दिया, तथा "विना ते अग्रे शेधा ब्रयाणि विना ते धाम विभूता पुरून्ना । विद्या ते नाम परम गुहा यद्विद्मा तमुत्सं यत भाजगंथ ॥" अर्थात् हे अग्रनेता, हम तेरे इन तीन प्रकार के तीन रूपों को जानते हैं. इनके अतिरिक्त तेरे पूर्व के बहुत प्रकार से धारण किये हुए रूपों को भी हम जानते हैं. इनके अतिरिक्त तेरा जो निगूढ़ परमधाम है, उसको भी हम जानते हैं. और उच्च मार्ग को भी हम जानते हैं जिससे तू हमें प्राप्त होता है. उक्त श्रुति से स्पष्टतः प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में भगवान् वृषभ के पूर्व जातक लोक में पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे. वैदिक रुद्र के विकसित रूप शतपथ ब्राह्मण में रुद्र के जो-रुद्र, शन, पशुपति, उग्र, अशनि, भव, महादेव, ईशान, कुमार-ये नौ नाम हैं, वे अग्नि १. Dr. H. R. Hall : The ancient History of far Ecst 104, 77, 158, 203, 367, 402. २. अथर्ववेद.१८, १,१. ६. ऋग्वेद, १०, ४५, १. ४. वही, १०, ४५, २. ५. तान्येतानि अष्टौ रुद्रःशर्वःपशुपति उग्रः अशनिः भवः । महानदेवः ईषानः अग्निरूपाणि कुमारो नवम् ।। -शतपथ ब्राह्मण ६,१,३,१८. % 3AIITTA PANATALIMIMALAUREDITATRAPRILDIMAIGATION M ConyANP JNILIM MInbaumAAAAAAAD MARATHIMACIM Inm Jain Education Interational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211954
Book TitleVrushabhdev tatha Shiv Samabandhi Prachya Manyataye
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajkumar Jain
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages21
LanguageHindi
ClassificationArticle & Mithology
File Size2 MB
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