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________________ ज्य को चेतना के के मन में सृष्टि के समएवं बार्थ और विक्के प्रति अपना ज्योति जगानमय को मनुष्य को महावी प्रत्येक व्यक्तिबात में पहुंचे हुए जिस धम्म समायणा की भावना है; जीवन में अशान्ति है। शांति में जो जातिगत एवं वर्गगत जहर घुला हुआ है, उसको हम आज हमें मनुष्य को चेतना के केन्द्र में प्रतिष्ठित कर उसके दूर कर सकत ह । पुरुषार्थ और विवेक को जागृत कर, उसके मन में सृष्टि के समस्त प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा बन सकता है : जीवों एवं पदार्थों के प्रति अपनत्व का भाव जगाना है; मनुष्य एवं प्रत्येक व्यक्ति साधना के आधार पर इतना विकास कर मनुष्य के बीच आत्मतुल्यता की ज्योति जगानी है जिससे परस्पर सकता है कि इस स्थिति में पहुंचे हुए आदमी को देवता लोग भी समझदारी, प्रेम, विश्वास पैदा हो सके । मनुष्य को मनुष्य के नमस्कार करते हैं । 'देवावितं नमंसन्ति जस्स धम्म समायणो ।' खतरे से बचाने के लिए हमें आधुनिक चेतना सम्पन्न व्यक्ति को महावीर ने ईश्वर की परिकल्पना नहीं की; देवताओं के आगे आस्था एवं विश्वास का सन्देश प्रदान करना है। झुकने की बात नहीं की अपितु मानवीय महिमा का जोरदार हमारा दर्शन ऐसा होना चाहिये जो मानव मात्र को सन्तुष्ट समर्थन करते हुए कहा कि जिस साधक का मन धर्म में रमण कर सके, मनुष्य के विवेक एवं पुरुषार्थ को जागृत कर उसको करता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं । व्यक्ति अपनी ही शान्ति एवं सौहार्द का अमोघ मंत्र दे सकने में सक्षम हो । इसके जीवन-साधना के द्वारा इतना उच्चस्तरीय विकास कर सकता है लिये हमें मानवीय मूल्यों की स्थापना करना होगी, सामाजिक कि आत्मा ही परमात्मा बन सकती है। बंधुत्व का वातावरण निर्मित करना होगा, दूसरों को समझने और मीकि का इतिहास उनका जीवन आकाश से पूर्वाग्रहों से रहित मनःस्थिति में अपने को समझाने के लिये तत्पर पीसनेमाका अति पीसदी आकाशकी होना होगा; भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की प्रतिष्ठा करनी ओर जाने का उपक्रम है । नारायण का नर शरीर धारण करना होगी; उन्मुक्त दृष्टि से जीवनोपयोगी दर्शन का निर्माण करना नहीं है अपितु नर का ही नारायण बनना है । वे अवतारवादी होगा | धर्म एवं दर्शन का स्वरूप ऐसा होना चाहिये जो प्राणी मात्र परम्परा के पोषक नहीं अपितु उत्तारवादी परम्परा के तीर्थंकर थे । को प्रभावित कर सके एवं उसे अपने ही प्रयलों के बल पर उन्होंने अपने जीवन की साधना के द्वारा, प्रत्येक व्यक्ति को यह विकास करने का मार्ग दिखा सके । ऐसा दर्शन नहीं होना चाहिए प्रमाण दिया; उसे यह विश्वास दिलाया कि यदि वह साधना कर जो आदमी आदमी के बीच दीवारें खड़ी करके चले । धर्म और सके, राग-द्वेष को छोड़ सके तो कोई ऐसा कारण नहीं है कि वह दर्शन को आधुनिक लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के आधारभूत प्रगति न कर सके । जब प्रत्येक व्यक्ति प्रगति कर सकता है, जीवन मूल्यों - स्वतंत्रता, समानता, विश्व बंधुत्व तथा आधुनिक अपने ज्ञान और साधना के बल पर उच्चतम विकास कर सकता है वैज्ञानिक निष्कर्षों का अविरोधी होना चाहिए । और तत्वतः कोई किसी की प्रगति में न तो बाधक है और न जैन : आत्मानुसंधान का दर्शन : साधक तो फिर संघर्ष का प्रश्न ही कहां होता है ? इस तरह "जैन" साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं है । यह सम्प्रदायों से अतीत उन्होंने एक सामाजिक दर्शन दिया । होने की प्रक्रिया है । सम्प्रदाय में बंधन होता है। यह बंधनों से प्रत्येक जीवन में आत्म शक्ति : मुक्त होने का मार्ग है। "जैन" शाश्वत जीवन पद्धति तथा जड़ सामाजिक समता एवं एकता की दृष्टि से श्रमण परम्परा का एवं चेतन के रहस्यों को जानकर आत्मानुसंधान की प्रक्रिया है। अप्रतिम महत्व है । इस परम्परा में मानव को 'मानव' के रूप में जैन दर्शन : प्रत्येक आत्मा की स्वतंत्रता की उद्घोषणा : देखा गया है; वर्णों सम्प्रदायों, जाति, उपजाति, वादों का लेबिल भगवान महावीर ने कहा - "पुरिसा ! तुममेव तुमं मित्तं" चिपकाकर मानव मानव को बांटने वाले दर्शन के रूप में नहीं । मानव महिमा का जितना जोरदार समर्थन जैन-दर्शन में हुआ है वह पुरुष तू अपना मित्र स्वयम् है । जैन दर्शन में आत्मा के अप्रतिम है । भगवान महावीर ने आत्मा की स्वतंत्रता की स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है - 'अप्पा कत्ता विकत्ता प्रजातंत्रात्मक उद्घोषणा की । उन्होंने कहा कि समस्त आत्मायें य दुहाण य सुहाण य' आत्मा ही दुःख एवं सुख का कर्ता या स्वतंत्र हैं । विवक्षित किसी एक द्रव्य तथा उसके गुणों एवं पर्यायों विकर्ता है । कोई बाहरी शक्ति आपको नियंत्रित, संचालित एवं का अन्य द्रव्य या उसके गुणों और पर्यायों के साथ किसी प्रकार प्रेरित नहीं करती । आप स्वयम् ही अपने जीवन के ज्ञान से चरित्र का कोई सम्बन्ध नहीं है। से उच्चतम विकास कर सकते हैं । यह एक क्रान्तिकारी विचार है। इसको यदि हम आधुनिक जीवन-सन्दर्भो के अनुरूप व्याख्यायित इसके साथ-साथ उन्होंने यह बात कही कि स्वरूप की दृष्टि का सकें तो निचित से विश्व में सालो से समस्त आत्मायें समान हैं । अस्तित्व की दृष्टि से समस्त आत्मायें और दर्शन से निरन्तर दूर होते जा रहे हैं, इनसे जुड़ सकते हैं। स्वतंत्र हैं; भिन्न-भिन्न हैं किन्तु स्वरूप की दृष्टि से समस्त आत्मायें समान भगवान महावीर का दूसरा क्रान्तिकारी एवं वैज्ञानिक विचार हैं । मनुष्य मात्र में आत्मशक्ति है। यह है कि मनुष्य जन्म से नहीं अपितु आचरण से महान् बनता शारीरिक एवं मानसिक विषमताओं है । इस सिद्धान्त के आधार पर उन्होंने मनुष्य समाज का समस्त का कारण कर्मों का भेट है। जीव दीवारों को तोड़ फेंका । आज भी मनुष्य और मनुष्य के बीच खड़ी अपने ही कारण से संसारी बना है की गयी जितने प्रकार की दीवारें हैं उन सारी दीवारों को तोड़ देने और अपने ही कारण से मुक्त होगा। की आवश्यकता है। यदि हम यह मान लेते है कि "मनुष्य जन्म व्यवहार से बंध और मोक्ष के हेत से नहीं आचरण से महान् बनता है" तो समाज की समता एवं । श्रीमद् जयन्तसेनसूरि अभिनन्दन ग्रंथ / विश्लेषण अजर अमर रहना नहीं, चार दिनों का बास । जयन्तसेन सिध्दि मिले, रखो अरिहन्त आश ।। www.jainelibrary.org. 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SR No.211941
Book TitleVishwadharm ke Rup me Jain Dharm Darshan ki Prasangikta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahaveer Saran Jain
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size4 MB
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