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________________ प्राचीन आगम-ग्रन्थों का सम्पादन ६९. का प्रमाण क्रमशः घटता जाता है :-'जे' में १८३, 'त' में १४ तो 'हे' और 'को' में मात्र ९ प्रतिशत ही रह जाता है। इससे स्पष्ट साबित होता है कि ग्रन्थ के मूल प्राकृत शब्दों में काल की गति के साथ लेहियों के हाथ ध्वन्यात्मक परिवर्तन किस गति से बढ़ता गया है। इस दृष्टि से वि० आ० भा० का यह विश्लेषण बहुत ही उपयोगी है । इसके आधार से हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि यदि वि० आ० भा० की भाषा में कुछ शताब्दियों के बाद इतना परिवर्तन आ सकता है तो फिर मूल आगम ग्रन्थों की भाषा में एक हजार और पन्द्रह सौ वर्षों के बाद कितना परिवर्तन आया होगा इसका अन्दाज सरलता से लगाया जा सकता है। भाषा सम्बन्धी इस परिवर्तन के दो कारण रहे हैं-एक तो समकालीन भाषा का परिवर्तित रूप और द्वितीय व्याकरणकारों द्वारा प्रस्तुत किये गये भाषा सम्बन्धी नियम । प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने यदि ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से हरेक भाषा का स्वरूप निरूपित किया होता तो शायद यह परिस्थिति नहीं होती। व्याकरणों में आर्ष प्राकृत के कुछ उदाहरण तो अवश्य दिये गये हैं परन्तु मध्यवर्ती व्यंजनों का लोप ( कुछ व्यंजनों के घोषीकरण के सिवाय) सर्वव्यापी सभी प्राकृत भाषाओं पर लागू हो जाता हो ऐसा फलित होता है; जबकि प्राचीन प्राकृत भाषाओं-मागधी, सेनी अर्धमागधी आदि में इस प्रकार का लोप होना ऐतिहासिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। बड़े पैमाने पर लोप महाराष्ट्री प्राकृत में ही हुआ है और इस भाषा का काल ई० सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों का माना जाता है । अनेक प्राचीन लेखों में उत्कीर्ण भाषा-स्वरूप पर विचार करें तब भी यही फलित होता है। उदाहरण के तौर पर महावीर के ८४ वर्ष बाद में बडली ( राज० ) में उपलब्ध शिलालेख में मध्यवर्ती व्यंजन का लोप नहीं मिलता, नामिक विभक्ति-'ते' और 'ये' हैं, उसके स्थान पर 'ए' नहीं है। अशोक के शिलालेखों में ध्वनि विकार का प्रारम्भ हो गया है, घोषीकरण, अघोषीकरण एवं लोप का प्रमाण ५ से ६ प्रतिशत ही है। मौर्यकालीन अन्य शिलालेखों में भी यही प्रमाण है। खारवेल के शिलालेख में घोषीकरण बढ़ गया है। आठ में से छः बार 'थ' का 'ध' मिलता है हालाँकि वर्ण-विकार तो ५-६ प्रतिशत ही मिलता है। विभिन्न प्रकार के प्राचीन उत्कीर्ण लेखों से पता चलता है कि मध्यवर्ती व्यंजनों के लोप की प्रवृत्ति का प्रचलन उत्तर पश्चिम और पश्चिम भारत में सबसे पहले हआ था। इतना ही नहीं परन्त मध्यवर्ती 'न' के 'ण' वर्तन भी इसी क्षेत्र की देन है। उत्तर-पश्चिम भारत में प्राप्त ई० सन् प्रथम शताब्दी के तीन लेखों में (पंजतर, कलवान और तक्षशिला; सरकार संस्करण, नं०३२,३३,३४) के विश्लेषण से यह साबित होता है कि उनकी भाषा में लोप ३०%, यथावत् स्थिति ५३% और सघोष-अघोष १७% मिलता है) कुल लोप २७, यथावत् ४७, सघोष १३ और अघोष २ = (८९ प्रसंग)। इनमें प्रारम्भिक 'न' का 'ण' में परिवर्तन १००% है और मध्यवर्ती 'न' का ७५% मिलता है। पश्चिम भारत में नासिक, कण्हेरी और जुनर के लेखों में भी लोप एवं सघोष की प्रवृत्ति अधिक मिलती है। 'न' का 'ण' में परिवर्तन भी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो रहा है। इस ध्वन्यात्मक परिवर्तन की दृष्टि से 'इसिभासियाई' का अध्ययन भी महत्त्वपूर्ण है। यह भी एक प्राचीन कृति मानी जाती है । शुब्रिग महोदय द्वारा संपादित संस्करण में अध्याय नं. १,२,३, ५,११, २९ और ३१ में मध्यवर्ती लोप ११ से ३१% के बीच है, यथावत् स्थिति ४५ से ८१% है। इन सातों अध्ययनों का औसत है-लोप २७३%, यथावत् ६०३% तथा सघोष अघोष १२% 1 इसका संपादन मात्र दो प्रतों के आधार से किया गया है। पाठान्तरों की बहुलता नहीं है जो हमें Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211932
Book TitleVishevashyashaka Bhashya ke Pathantaro Utkirn Prachin Abhilekh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherUSA Federation of JAINA
Publication Year1987
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size530 KB
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