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________________ . ११० श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : नवम खण्ड परिवर्तन सूक्ष्मजगत में और भी अधिक तेजी से, शीघ्रता से हो रहा है । शरीर के ऊपरी भाग से भीतरी भाग में, शरीर में उत्पन्न विद्युत्-चुम्बकीय लहरों में, मन में, अवचेतन मन में हजारों-लाखों गुना अधिक द्रुतगति से परिवर्तन हो रहा है । यहाँ तक कि वस्तु के सूक्ष्मतम स्तर पर यह उत्पाद-व्यय रूप परिवर्तन एक पल में करोड़ों-अरबों व इससे भी अधिक अगणित बार होता है ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। इस प्रकार विपश्यना से जैसे-जैसे आवरण क्षीण होते जाते हैं वैसे ही वैसे संसार की अनित्यता का प्रत्यक्ष दर्शन (साक्षात्कार) होता जाता है। ऐसे अनित्य संसार में आत्म-बुद्धि रखना, उसे अपना मानना, उससे रक्षण व शरण की आशा करना अज्ञानता है। वह संयोग में वियोग का, जीवन में मृत्यु का दर्शन करने लगता है जिससे उसमें तन, मन, धन, जन आदि समस्त परिवर्तनशील अनित्य वस्तुओं के प्रति ममत्वभाव अर्थात् मैं व मेरेपन रूप अपनेपन का 'आत्म-भाव' हटता जाता है और अनात्मभाव की जागति होती जाती है । वह अनुभूति के आधार पर यह भी जानता है कि रोग, वृद्धावस्था, इन्द्रियों की शक्ति-क्षीणता, मृत्यु, अभाव, वेदना, पीड़ा आदि तो दुःख हैं ही परन्तु संसार में जिसे सुख या आनन्द कहा जाता है वह भी दुःखरूप ही है। कारण कि वह आनन्द राग व मोहजनित होता है। राग की उत्पत्ति चित्त में असंख्य लहरों रूपी तूफान उठने से होती है। यह राग या चित्त की लहरों का तूफान, समता के सागर की शान्ति को भंग कर देता है जिससे चित्त अशान्त, आकूल, आतुर व तनावमय तथा मूच्छित हो जाता है। वह रागजनित चित्त की इस स्थिति में अर्थात् इन्द्रिय-भोगों के सुख में असुख (दुःख) का दर्शन करने लगता है और अनित्य, अशरण व दु:खद संसार में सम्बन्ध स्थापित करने व सुख चाहनेरूप अज्ञानता से अपने को बचाता है। विपश्यक यह भी देखता है कि संसार की प्रत्येक घटना कारण-कार्य के अनिवार्य नियमानुसार घटित हो रही है। वस्तुतः कोई भी घटना अप्रत्याशित, आकस्मिक या अनहोनी रूप में नहीं घटती है। जो भी घटित हो रहा है वह कर्म के नियम (कारण-कार्य के सिद्धान्त या विधान) के अनुसार घटित हो रहा है। जिस प्रकार प्रकृति के नियमानुसार जैसा बीज बोया जाता है वैसा ज्ञान मिलता है, उसी प्रकार जो जैसा कर्म करता है उसे उसका वैसा ही फल भोगना पड़ता है अर्थात जो भी सुखद-दुःखद स्थिति प्राप्त होती है वह अपने ही पूर्व में किये गये कर्मों का फल है। अतः उसमें न तो शिकायत व शोक की बात है और न हर्ष या विषाद की। उस घटना या परिस्थिति को भला-बुरा मानना या कोसना व राग-द्वेष करना अज्ञानता है। विपश्यना से सूक्ष्मदर्शन या साक्षात्कार करने में प्रगति होती है, प्रज्ञा बढ़ती जाती है। फलतः लोक के सूक्ष्मतत्त्वों का या गहन नियमों का ज्ञान अधिक से अधिक होता जाता है तथा ग्रन्थिनिर्माण, आस्रव, कर्मबन्ध, कर्मविपाक, जाति-स्मरण, जन्म-मरण, संवर-निर्जरा, विमोक्ष आदि का प्रत्यक्ष (स्पष्ट) ज्ञान होने लगता है। जो जितना सूक्ष्म होता है वह उतना ही विभु व शक्तिशाली होता है। इस नियम के अनुसार विपश्यना द्वारा सूक्ष्मतत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण होने से सीमित व विकृत ज्ञान विशद विशुद्ध होता जाता है। अन्त में ज्ञान पर से जब सर्व आवरण हट जाते हैं तो पूर्ण निर्मल अनन्तज्ञान प्रकट हो जाता है । मोहनीय क्षय-विपश्यना के अभ्यास से जैसे-जैसे समता व सूक्ष्म अनुभव की शक्ति बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे राग-द्वेष-मोह आदि से उठने वाली लहरों का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगता है तथा वह यह भी देखने लगता है कि रागद्वेष से नवीन ग्रन्थियों का निर्माण होता है। ये ग्रन्थियाँ समय पाकर फल देती हैं, इनसे तन-मन का सर्जन होता है तथा जन्म-मरण व सुखद-दुःखद संवेदनाएँ पैदा होती हैं। उन सुखद-दुःखद संवेदनाओं में प्रतिक्रिया करने से राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं। फिर नवीन ग्रन्थियों का निर्माण होता है, जन्म-मरण, सुखद-दुःखद संवेदनाओं की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार यह क्रम बार-बार चलने लगता है। यही भव-भ्रमण अनन्तकाल से चल रहा है तथा वह यह भी अनुभव करने लगता है कि लहर द्वेष की उठे या राग की उठे अथवा अन्य किसी भी प्रकार की उठे उसमें समताजनित शान्ति, सुख, स्वाधीनता, सन्तुष्टि का लोप हो जाता है और अशान्ति, क्षुब्धता व आकुलता, आतुरतारूप दुःख का उदय हो जाता है। इस प्रकार जहाँ पहले वह राग-द्वेष, मोह, हिंसा, झूठ आदि दोषों में सुख का आस्वादन करता था अब इनमें दुःख का अनुभव करने लगता है। इस प्रकार वह विपश्यक इस परिणाम पर पहुंचता है कि दुःख या भव-चक्रभेदन का एक ही उपाय है कि नवीन ग्रन्थियों का निर्माण न हो और पुरानी ग्रन्थियों का भेदन व उदीरणा होकर निर्जरा हो जाय । नवीन ग्रन्थियों का निर्माण पुराने कर्म के फल भोगते समय राग-द्वेषरूप प्रतिक्रिया करने से होता है । अतः नवीन ग्रन्थियों के निर्माण को रोकने का एक ही उपाय है कि पुराने कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न सुखद संवेदनाओं में राग न करे, दुःखद संवेदनाओं (स्थितियों) में द्वेष न करे अर्थात् समता (द्रष्टाभाव) में रहे । इस प्रकार समता में रहनेरूप संवर से नवीन ग्रन्थियों (कर्मों) का निर्माण रुक जाता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211924
Book TitleVipashyana Karmkshay ka Marg
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhailal Lodha
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ritual
File Size608 KB
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