SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 3
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ नहीं मानी जा सकती है। विचार सार प्रकरण में आई हुई "पंचसए पणसीए" गाथाका अर्थ एच० ए० शाहने बताया है कि यहाँ विक्रय संवत् के स्थानपर गुप्त संवत्का ग्रहण होना चाहिए । गुप्त संवत् ५८५ का अर्थ ई० सन् ७८५ है । इस प्रकार हरिभद्रका स्वर्गारोहण काल ई० सन् ७८५ के लगभग आता है । यतिवृषभकी तिलोयपण्णत्त के अनुसार वीर निर्वाण ४६१ वर्ष व्यतीत होनेपर शक नरेन्द्र (विक्रमादित्य) उत्पन्न हुआ । इस वंशके राज्यकालका मान २४१ वर्ष है और गुप्तोंके राज्यकालका प्रमाण २५५ वर्ष है | अतः ई० सन् १८५ या १८६ वर्षके लगभग गुप्त संवत्का आरम्भ हुआ होगा । इस गण नाके आधारपर मुनि जिनविजयजीने ई० सन् ७७० या ७७१ के आसपास हरिभद्रका समय माना है । हरिभद्र समयकी उत्तरी सीमाका निर्धारण 'कुवलयमाला' के रचयिता उद्योतन सूरिके उल्लेख द्वारा होता | इन्होंने 'कुवलयमाला' की प्रशस्ति में इस ग्रन्थकी समाप्ति शक संवत् ७०० बतलायी है और अपने गुरुका नाम हरिभद्र कहा है ।" उपमितिभव प्रपञ्च कथाके रचयिता सिद्धर्षिने अपनी कथाकी प्रशस्ति में आचार्य हरिभद्रको अपना गुरु बताया है । विषं विनिधूय कुवासनामयं व्यचीचरद् यः कृपया मदाशये । अचिन्त्यवीर्येण सुवासनासुधां नमोऽस्तु तस्मै हरिभद्रसूरये ॥ अर्थात् --- हरिभद्र सूरिने सिद्धर्षिके कुवासनामय मिथ्यात्व रूपी विषका नाश कर उन्हें अत्यन्त शक्तिशाली सुवासनामय ज्ञान प्रदान किया था, तथा उन्हीं के लिये चैत्य वन्दन सूत्रकी ललितविस्तरा नामक वृत्तिकी रचना की थी । 'उपमितिभव प्रपंच कथा' के उल्लेखों के देखनेसे ज्ञात होता है कि हरिभद्र सूरि सिद्धर्षिके साक्षात् गुरु नहीं थे, बल्कि परम्परया गुरु थे । प्रो० आभ्यंकरने इन्हें साक्षात् गुरु स्वीकार किया है । परन्तु मुनि जिनविजयजीने प्रशस्तिके 'अनागतं' शब्दके आधारपर परम्परा गुरु माना है । इनका अनुमान है कि आचार्य हरिभद्र विरचित 'ललित विस्तरा वृत्ति' के अध्ययन से सिद्धर्षिका कुवासनामय विष दूर हुआ था । इसी कारण उन्होंने उक्त वृत्तिके रचयिताको 'धर्मबोधक गुरु' के रूपमें स्मरण किया है । अतएव स्पष्ट है कि प्रो० आभ्यंकरने हरिभद्रको सिद्धर्षिका साक्षात् गुरु मानकर उनका समय विक्रम संवत् ८००-९५० माना है, वह प्रामाणिक नहीं है और न उनका यह कथन ही यथार्थ है कि 'कुवलयमाला' में उल्लिखित शक संवत् ही गुप्त संवत् है । वस्तुतः आचार्य हरिभद्र शंकराचार्य के पूर्ववर्ती हैं । सामान्यतः सभी विद्वान् शंकराचार्यका समय ईस्वी सन् ७८८से८२० ई० तक मानते हैं । हरिभद्रने अपने से पूर्ववर्ती प्रायः सभी दार्शनिकोंका उल्लेख किया है । शंकराचार्यने जैन दर्शन के स्याद्वाद सिद्धान्त सप्तभंगी न्यायका खण्डन भी किया है । इनके नामका उल्लेख अथवा इनके द्वारा किये गये खण्डनमें प्रदत्त तर्कोंका प्रत्त्युत्तर सर्वतोमुखी प्रतिभावान् हरिभद्रने नहीं दिया । इसका स्पष्ट अर्थ है कि आचार्य हरिभद्र शंकराचार्यके उद्भव के पहले ही स्वर्गस्थ हो चुके थे । प्रो० अभ्यंकरने हरिभद्रके ऊपर शंकराचार्यका प्रभाव बतलाया है और उन्हें शंकराचार्यका पश्चात् १. सो सिद्धतेण गुरु जुत्ती - सत्थेहि जस्स हरिभद्दो । बहु सत्थ- गंथ वित्थर पत्थारिय-पयड सम्वत्थो ॥ कुवलयमाला, अनुच्छेद ४३०पू० २८२ २. हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णयः पृ० ६ पर उद्धृत । इतिहास और पुरातत्त्व : १६९ २२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211817
Book TitleRajasthan ka Yug Sansthapak Katha Kavya Nirmata Haribhadra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size873 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy