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________________ इसे और स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं "विघ्नों के समय उन्हें सहने में असमर्थता दिखलाने से वे मिटते नहीं और न दीनता दिखाने से मौत से ही बचा जा सकता है, इसलिए साधक उपसर्गों तथा विघ्नों के आने पर मन में जरा भी क्लेश न मानता हुआ, 'परब्रह्म परमात्मा का चिन्तन करें। 4 ध्यान हेतु समुचित स्थान : ध्यान के लिए स्थान आदि का निर्देश करते हुए आचार्य सोमदेव लिखते हैं " साधक आत्म-साक्षात्कार हेतु ध्यान के लिए ऐसे स्थान को स्वीकार करे, जहाँ उसकी इन्द्रियाँ व्यास विशेष आसक्ति रूप चोर का विघ्न न पायें । अर्थात् ध्यान के लिए ऐसे स्थान का चुनाव किया जाना चाहिये, जहाँ ऐसे व्यक्ति और ऐसे पदार्थ न हों, जो मन में आसङ्ग आसक्ति, मोह उत्पन्न करें।६ साधना के लिए शरीर की उपयोगिता मानते हुए वे लिखते है : " यद्यपि इस शरीर के जन्म का कोई महत्व नहीं है, पर यह तप, साधना आदि के द्वारा संसार समुद्र को पार करने के लिए तुम्बिका की तरह सहायक है, इसलिए साधना में इसकी उपयोगिता मानते हुए इसकी रक्षा करनी चाहिये।”७ आचार्य केवल यौगिक विधि विधान की बाह्य प्रक्रिया मात्र को महत्व नहीं देते। वे लिखते हैं। : "धैर्यहीन या कायर पुरुष के लिए जैसे कवच धारण करना वृथा है, धान्य रहित खेत की बाड़ करना निष्प्रयोज्य है, उसी के प्रकार ध्यान शून्य ध्यान में जरा भी प्रवृत्त न होने वाले पुरुष लिए तत्संबंधी विधि विधान व्यर्थ है। सबीज निर्बीज ध्यान : सबीज और निर्बीज ध्यान के विवेचन के सन्दर्भ में वे लिखते हैं : " जैसे दीपक वायु रहित स्थान मे निश्चलता पूर्वक प्रकाशमान रहता है, वैसे ही साधक का मन जब बाह्य और आभ्यन्तरिक अज्ञान रूपी वायु से अचंचल रहता हुआ तत्वों के आलोकन - मनन में उल्लसित रहता है, तब उसका ध्यान सबीज (पृथकत्व वितर्क सविचार) ध्यान कहा जाता है। व्यापार सब साधक के चित्तरूपी निर्झर की प्रवृत्तियाँ निर्विचार - संक्रमण रहित (द्रव्य से पर्याय और पर्याय से द्रव्य आदि के परिशीलन रूप संक्रमण से शून्य) होती है, आत्मा अपने विशुद्ध स्वरूप में ही स्फुरित आनन्दित रहती है, उसका वह ध्यान निर्बीज (एकत्व वितर्क अविचार ) कहा जाता है। Jain Education International - चित्त अनन्त सामर्थ्यशील है, पारद के समान चंचल है। जैसे पारद अग्नि में मूच्छित मारित एवं शुद्ध होकर सिद्ध हो जाता है, उसी प्रकार चित्त अध्यात्म तेज या अध्यात्म ज्ञान में प्रज्वलित होकर स्थिर एवं शुद्ध हो जाता है जैसे उस सिद्ध किये हुए पारद से रसायन के क्षेत्र में क्या साधित नहीं होता अर्थात् उसमें अद्भुत वैशिष्ट्य आ जाता है, उसी प्रकार जिस योगी का ज्ञान सिद्ध और स्थिर हो गया, उसके लिए तीनों जगत् में क्या हुआ अर्थात् सब कुछ सध गया । " यदि यह मन रूपी हंस सर्वथा निर्मनस्क मनोव्यापार रहित हो जाय, चंचलता शून्य बन जाय, आत्म-स्वरूप में सर्वथा स्थिर हो जाय, तो वह सर्वदर्शी बोधरूपी हंस में परिवर्तित हो जाता है। सकल जगत रूपी मानसरोवर उसका अधिष्ठान बन जाता है । साधक मानसिक दृष्टि से आत्मा आदि ध्येय वस्तु में, चैतसिक एकाग्रता साधने के रूप में क्रियाशील रहता है, हेय उपादेय आदि भावों को यथावत् जान लेता है और किसी भी तरह विभ्रान्त नहीं होता- तत्व एवं अतत्व में समान बुद्धि नहीं लाता। १९ ध्यान का महात्म्य : आचार्य ध्यान का महात्म्य वर्णित करते हुए लिखते हैं "बद्यपि भूमि में रत्न उत्पन्न होते हैं, किन्तु सर्वत्र नहीं होते, उसी प्रकार ध्यान यद्यपि आत्मा में उद्भूत होता है, पर सभी आत्माओं में उत्पन्न नहीं होता। ० अष्टदशी / 2190 For Private & Personal Use Only - मुनिवृन्द ध्यान (शुक्ल ध्यान) का उत्कृष्टसमय अन्तमुहूत बतलाते हैं, निश्चय ही इससे अधिक मन का स्थिर रहना दुर्धर है, जिस प्रकार वज्र क्षणभर में विशाल पर्वत को छिन्न-भिन्न कर डालता है, उसी प्रकार ध्यान आत्मा के मूल गुणों का घात करने वाले कर्म समूह को विदीर्ण कर डालता है। समुद्र के पानी को यदि कोई सैंकड़ों कल्पों युगान्तरों तक भी चुल्लुओं से उलीचता जाय तो भी समुद्र खाली नहीं होता, परन्तु प्रलयकाल का प्रचण्ड वायु उसे अनेक बार अविलम्ब खाली करने की क्षमता लिए रहता है, उसी प्रकार आत्मा में मुहूर्त भर के लिए अद्भुत धर्मध्यान घातिकर्म समूह को अविलम्ब ध्वस्त कर डालता है। जैसे रूप में, मरुत-प्राणवायु (परकाय प्रवेश आदि) में बाह्य वस्तुओं में मन को स्थिर करने से व्यक्ति अपना अभीप्सित पा लेता है, वैसे ही आत्मा द्वारा परमात्मा में चित्त को स्थिर करने से परमात्मपद प्राप्त हो जाता है।"१० योग के सहायक हेतु . वे योग के सहायक हेतुओं का निम्नांकित रूप में वर्णन करते हैं www.jainelibrary.org
SR No.211771
Book TitleYashastilaka Champu me Dhyan ka Vishleshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChhaganlal Shastri
PublisherZ_Ashtdashi_012049.pdf
Publication Year2008
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Meditation Yoga
File Size578 KB
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