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________________ मूलाचार वह भी समिति, ३ गुप्ति आदि का जो विवेचन उपलब्ध होता है उत्तराध्ययन के और दशवैकालिक में किंचित् भेद के साथ उपलब्ध होता है। इसी प्रकार मूलाचार के पिण्डशुद्धि अधिकार की ८३ गाथाएँ हैं। इनमें भी अधिकांश गाथाएँ श्वेताम्बर परम्परा के पिण्डनिर्युक्ति नामक ग्रन्थ में यथावत् रूप में उपलब्ध होती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूलाचार की अधिकांश सामग्री शेताम्बर परम्परा के उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, पिण्डनिर्युक्ति, आउरपच्चक्खाण महापच्चक्खाण, आवश्यकनियुक्ति, चन्द्रवेध्यक आदि श्वेताम्बर परम्परा के मान्य उपर्युक्त ग्रन्थों से संकलित है आश्चर्य तो यह लगता है कि हमारी दिगम्बर परम्परा के विद्वान् मूलाचार में कुन्दकुन्द के ग्रन्थों से मात्र २१ गाथाएँ समान रूप से उपलब्ध होने पर इसे कुन्दकुन्द की कृति सिद्ध करने का साहस करते हैं और जिस परम्परा के ग्रन्थों से इसकी आधी से अधिक गाथाएँ समान रूप से मिलती है उसके साथ इसकी निकटता को दृष्टि से ओझल कर देते हैं। मूलाचार की रचना उसी परम्परा में सम्भव हो सकती है जिस परम्परा में उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आवश्यकनियुक्ति, पिण्डनिर्युक्ति, महापचक्खाण, आउरपचक्खाण आदि ग्रन्थों के अध्ययन-अध्यापन की परम्परा रही है। वर्तमान की खोजों से यह स्पष्ट हो चुका है कि यापनीय परम्परा से इन ग्रन्थों का अध्ययन होता था। इसी प्रकार यापनीय परम्परा में अपराजितसूरि ने उत्तराध्ययन और दशवैकालिक पर टीकाएं लिखकर इसी बात की पुष्टि की है कि इसका अध्ययन और अध्यापन उनकी परम्परा में प्रचलित था। जो परम्परा आगम ग्रन्थों का सर्वथा लोप मानती है उस परम्परा में मूलाचार जैसे ग्रन्थ की रचना सम्भव नहीं प्रतीत होती। यह स्पष्ट है कि जहाँ दक्षिण भारत में विकसित दिगम्बर अचेल परम्परा आगमों के विच्छेद की बात कर रही थी, वहीं उत्तरभारत में विकसित होकर दक्षिण की ओर जाने वाली इस यापनीय परम्परा में आगमों का अध्ययन बराबर चल रहा था। अतः इससे यही सिद्ध होता है कि मूलाचार की रचना कुन्दकुन्द की दिगम्बर परम्परा में न होकर यापनीयों की अचेल परम्परा में हुई है। स्वयं मूलाचार के पाँचवें पंचाचार नामक अधिकार की ७९वीं गाथा में" और ३८७ २० गाथा में आचारकल्प, जीतकल्प, आवश्यकनिर्युक्ति, आराधना, मरणविभक्ति, पच्चक्खाण, आवश्यक, धर्मकथा (ज्ञाताधर्मकथा) आदि ग्रन्थों के अध्ययन के स्पष्ट निर्देश हैं। मेरी दृष्टि से उक्त गाथाओं में निम्म्र ग्रन्थों का निर्देश होता है - ( १ ) आराधना, (२) निर्युक्ति, (३) मरणविभक्ति, (४) संग्रह (पंचसंग्रह), (५) स्तुति (देविन्दत्थुई), (६) प्रत्याख्यान (७) आवश्यक और (८) सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि इन ग्रन्थों में कौन-कौन से ग्रन्थ श्वेताम्बर परम्परा में मान्य एवं उपलब्ध है और कौन-कौन से दिगम्बर परम्परा में मान्य एवं उपलब्ध हैं। इन ग्रन्थों में सर्वप्रथम आराधना का नाम है आराधना के नाम से सुपरिचित ग्रन्थ शिवार्य का भगवती आराधना या मूलाराधना है। यह सुस्पष्ट है कि भगवती आराधना मूलतः दिगम्बर परम्परा का ग्रन्थ न होकर यापनीय संघ का ग्रन्थ है। मूलाचार Jain Education International एक विवेचन ९३ में जिस आराधना का निर्देश किया गया है, वह भगवती आराधना ही है। मूलाचार भी उसी यापनीय परम्परा का ग्रन्थ प्रतीत होता है क्योंकि मूलाचार के रचनाकार ने सर्वप्रथम उसी ग्रन्थ का नामोल्लेख किया है। दिगम्बर परम्परा में आराधना नाम का कोई ग्रन्थ नहीं है। यद्यपि श्वेताम्बर परम्परा में मरणविभक्ति नाम का जो ग्रन्थ है उसकी रचना जिन आठ प्राचीन श्रुत ग्रन्थों के आधार पर मानी जाती है उनमें मरणाविभक्ति, मरणविशोधि, मरणसमाधि, संलेखना श्रुत, भक्त्तपरिज्ञा, आतुरप्रत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान और आराधना है। प्रस्तुत गाथा में मरणविभक्ति, प्रत्याख्यान और आराधना ऐसे तीन स्वतन्त्र ग्रन्थों के उल्लेख हैं। यह सम्भव है कि मूलाचार का आराधना से तात्पर्य इसी प्राचीन आराधना से रहा होगा। यह आराधना भगवती आराधना की रचना का भी आधार रहा है। यदि हम आराधना का तात्पर्य भगवती आराधना लेते हैं तो हमें इतना निश्चित रूप से स्वीकार करना होगा कि मूलाचार का रचनाकाल भगवती आराधना की रचना के बाद का है और दोनों ग्रन्थों के आन्तरिक साक्ष्यों के आधार पर यह निर्णय करना होगा कि इनमें से कौन प्राचीन है। चूंकि यह एक स्वतन्त्र निबन्ध का विषय होगा इसलिए इसकी अधिक गहराई में नहीं जाना चाहता, किन्तु इतना अवश्य उल्लेख करूंगा कि यदि भगवती आराधना की रचना मूलाचार से परवर्ती है तो मूलाचार में लिखित यह आराधना, मरणसमाधि की अंगीभूत आराधना ही है। दोनों का नाम साम्य भी इस धारणा को पुष्ट करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किसी समय आराधना स्वतन्त्र ग्रन्थ था, जो आज मरणविभक्ति में समाहित हो गया है। श्वेताम्बर परम्परा में आगम ग्रन्थों की प्राचीनतम व्याख्याओं के रूप में नियुक्तियाँ लिखी गई श्वेताम्बर परम्परा में दस नियुक्तियाँ सुप्रसिद्ध हैं। नियुक्ति सम्भवतः द्वितीय भद्रबाहु की रचना मानी जाती है, किन्तु कुछ निर्युक्तियाँ उससे भी प्राचीन है। यह भी सुस्पष्ट है कि मूलाचार के षडावश्यक अधिकार में आवश्यकनियुक्ति की ८० से अधिक गाथाएँ स्पष्टतः मिलती है। अतः यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत गाथा में नियुक्ति का जो उल्लेख है वह श्वेताम्बर परम्परा में उपलब्ध नियुक्तियों से ही है। यह भी स्पष्ट है कि अधिकांश नियुक्तियाँ भद्रबाहु द्वितीय के द्वारा रचित हैं और इन भद्रबाहु का समय विक्रम की पाँचवीं शताब्दी है । इसमें एक बात अवश्य स्पष्ट होती है कि मूलाचार विक्रम की छठी शताब्दी के पूर्व की रचना नहीं है। मूलाचारकार यह कहकर 'अब मैं आचार्य परम्परा से यथागत आवश्यक नियुक्ति को संक्षेप में कहूँगा' इस तथ्य की स्वयं पुष्टि करता है कि उसके समक्ष आवश्यकनिर्युक्ति नामक ग्रन्थ रहा है। दूसरे अस्वाध्याय काल में पढ़ने योग्य ग्रन्थों की सूची में नियुक्ति का उल्लेख भी इसी तथ्य को सूचित करता है। दिगम्बर परम्परा में नियुक्तियाँ लिखी गई ऐसा कोई भी संकेत उपलब्ध नहीं है, अतः मूलाचार में नियुक्ति से तात्पर्य श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित निर्युक्तयों से ही है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि श्वेताम्बर और यापनीय आगमिक ग्रन्थ एक ही थे, उनमें मात्र शौरसेनी और महाराष्ट्री का भाषा भेद था। मूलाचार - 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SR No.211734
Book TitleMulachar Ek Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size703 KB
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