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________________ ५१४ धारा ने अध्यात्म, आदर्श एवं नैतिक जीवनदृष्टि को । आज दोनों एक दूसरे के बलाबल को समझ रहे हैं। संस्कृति शब्द संस्कृत भाषा का है। सम् उपसर्ग पूर्वक कृ करणे धातु से खुद का आगम करके तिनू प्रत्यय मिलाने पर संस्कृति शब्द बनता है। संस्कृति का सीधा और सहज अर्थ है-सम्यक् रीति से किये गये कार्य अर्थात् परिष्कृत कार्य । आक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार ' "The training and refinement of mind, tastes and manners; the condition of being thus trained and refined; the intellectual side of civilisation, the acquainting ourselves with the best that has been known and said in the world.” अर्थात् मस्तिष्क, रुचि और आचार-व्यवहार की शिक्षा और शुद्धि, इस प्रकार शिक्षित और शुद्ध होने की प्रक्रिया, सभ्यता का बौद्धिक पक्ष, विश्व की सर्वोत्कृष्ट कथित और ज्ञात वस्तुओं से स्वयं को परिचित कराना संस्कृति है। आप्टे की संस्कृत डिक्शनरी के अनुसार संस्कृति की व्याख्या इस प्रकार है? - To adorn, grace, decorate, (2) to refine, polish, (3) to purify, (4) to consecrate by | repeating mantras, (5) to cultivate, educate, train, (6) make ready, proper, equip, fitout, (7) to cook food, (8) to purify-cleanse, (9) to collect, heap |together. अर्थात् सजाना, संवारना, पवित्र करना होना, सुशिक्षित करना आदि। डॉ. सम्पूर्णानन्द की संस्कृति सम्बन्धी मान्यता भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वे एक प्रशस्त क्रान्तचेता के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं। उनके अनुसार ३, "वस्तुतः संस्कृति पद्धति, रिवाज या सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संस्था नहीं है नाचना गाना, साहित्य, मूर्तिकला, चित्रकला, गृहनिर्माण इन सबका अन्तर्भाव सभ्यता में होता है। संस्कृति अन्तःकरण है, सभ्यता शरीर है। संस्कृति सभ्यता द्वारा स्वयं को व्यक्त करती है। संस्कति वह साँचा है जिसमें समाज के विचार ढलते हैं; वह बिन्दु है जहाँ से जीवन की समस्याएँ देखी जाती है।" चर्चित सभी परिभाषाओं का मथितार्थ यह है कि हमारी जीवन-साधना का साररस ही संस्कृति है अर्थात् हमारी दृढीभूत चेतना-प्रेरक-जीवन की आन्तरिक पद्धति ही संस्कृति है। छान्दोग्योपनिषद् में संस्कृति के व्यापक स्वरूप की व्याख्या स्थायी महत्त्व की है। विश्व की सभ्यताओं का उन्नयन एवं पतन संस्कृति की तुला पर रखकर ही समझा जा सकता है। “कस्यापि देशस्य समाजस्य वा विभिन्न जीव व्यापारेषु सामाजिक सम्बन्धेषु वा मानवीयत्त्व दृष्टया प्रेरणाप्रदानां तत्तदादर्शानी समष्टिरेव संस्कृतिः । वस्तुतस्तस्यामेव सर्वस्यापि सामाजिक जीवनस्योतकर्षः पर्यवसति । उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि स्मृति ग्रन्थ तयैव तुलया विभिन्नसभ्यतानामुत्कर्षापकर्षी मीयेते । किं बहुना, संस्कृतिरेव वस्तुतः सेतुर्विधतिरेषां लोकानामसंभेदाय।४ अर्थात् किसी देश या समाज के विभिन्न जीवन-व्यापारों में या सामाजिक सम्बन्धों में मानवता की दृष्टि से प्रेरणा प्रदान करने वाले आदर्शों की समष्टि को ही संस्कृति समझना चाहिए। समस्त सामाजिक जीवन की समाप्ति संस्कृति में ही होती है। विभिन्न सभ्यताओं का उत्कर्ष तथा अपकर्ष संस्कृति द्वारा ही मूल्यांकित किया जाता है। उसके द्वारा ही लोगों को संगठित किया जाता है। मानव संस्कृति का सातत्य - जातिगत, धर्मगत एवं भूमिगत संकीर्ण प्रतिबद्धता को त्यागकर ही विश्वव्यापी मानव संस्कृति की अखंड धारा को समझा जा सकता है। संस्कृति किसी भी देश या जाति की प्रबुद्ध आन्तरिक चेतना की यह स्वस्थ एवं मीलिक विशेषता है जिसके आधार पर विश्व के अन्य देशों में उसका महत्त्वांकन होता है। आज किसी भी देश की संस्कृति ऐसी नहीं है जो अन्य देशों की संस्कृतियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित एवं पुष्ट न हो। सजीव संस्कृति सदा उदार एवं ग्रहणशील होती है। संस्कृति सदा एक विकासशील संस्था के रूप में रहकर ही किसी देश या जाति के गर्व का कारण बन सकती है। कुछ मौलिक विशेषताओं के साथ प्रत्येक संस्कृति के कुछ अन्तर्राष्ट्रीय तत्त्व भी होते हैं जो संस्कृति कम ग्रहणशील होती है, या अतीतोन्मुखी होती है, धीरे-धीरे वह अपना चैतन्य महत्त्व खोकर मात्र ऐतिहासिक संस्था बनकर रह जाती है। किन्तु इतिहास में भी सातत्य और परिवर्तनशीलता का प्रवाह या क्रम चलता ही रहता है। संस्कृति में भी यही क्रम नितान्त वांछनीय है। संस्कृति में वर्तमान का योग और भविष्यत् की सम्भावनाएं सदा अपेक्षित रहती हैं। वह पुरातन और नवीन का सुन्दर समन्वय है, मात्र प्राचीन उपलब्धियों भी व्याख्यायिका नहीं है। "हिन्दूसच, जैनसच, बौद्धसच, ईसाईसच या मुस्लिमसच जैसे बोल पढ़े लिखे लोगों को ही नहीं, अनपढ़ को भी बेमतलब जचेंगे। काश ऐसा ही हिन्दू संस्कृति, जैन-संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति इत्यादि बोलों के साथ भी होता। हमारे कान इन बोलों को भी बे-मतलब समझते होते, तो आज मनुष्यों की आत्माएँ कहीं ज्यादा मंजी हुई। मिलती, दुनियां के आदमी कहीं ज्यादा सुखी पाये जाते । संस्कृति को मानव संस्कृति के ही नाम से पुकारना ठीक जैचता है।५ आज के विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिकों और विचारकों का यह सुस्पष्ट मत है कि संसार की सभी जातियाँ मूलतः एक ही परिवार की शाखाएँ हैं। जलवायु की भिन्नता के कारण भाषा, रहन-सहन एवं रूप-रंग में कुछ अन्तर अवश्य है। यह बाहरी अन्तर है और इसके होते हुए भी भाव, विचार, विश्वास, अनुभूति, आदर्श एवं आकांक्षाओं में समस्त मानव जाति में विलक्षण समानता है। यही भीतरी समानता निर्णायक होती है। विश्व के कतिपय प्रमुख देशों की सांस्कृतिक विशेषताएँ धीरे-धीरे सभी देशों में आत्मसात् कर ली
SR No.211715
Book TitleManav Sanskruti ke Vikas me Shraman Sanskruti ki Bhoomika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavindra Jain
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Culture
File Size6 MB
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