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________________ १८ १९ - यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रत्य - जैन आगम एवं साहित्य भाष्यकार ने इस ग्रन्थ की रचना कौशल देश में अथवा ने उद्धृत की है, ऐसा प्रसंग से स्पष्ट प्रतीत होता है। अतः उसके पास के किसी क्षेत्र में की है, ऐसा अधिक संभव लगता व्यवहारभाष्य विशेषावश्यकभाष्य से पूर्व की रचना है, ऐसा है। भारत के १६ जनपदों में कौशल देश का महत्त्वपूर्ण स्थान मानने में कोई आपत्ति प्रतीत नहीं होती। था। प्रस्तुत भाष्य में कौशल देश से संबंधित दो-तीन घटनाओं व्यवहारभाष्य के कर्ता जिनभद्र से पूर्व हुए इसका एक का वर्णन है, इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि प्रबल हेत यह है कि जीतकल्प-चर्णि में स्पष्ट उल्लेख है कि ग्रन्थकार जहाँ क्षेत्र के आधार पर मनोरचना का वर्णन कर रहे कल्प. व्यवहार निशीथ आदि में प्रायश्चित्त का इतने विस्तार से हैं, वहाँ कहते हैं 'कोसलएसु अपावं सतेसु एक्क न पेच्छामी' निरूपण है कि पढ़ने वाले का मति-विपर्यास हो जाता है। शिष्यों अर्थात् कौशल देश में सैकड़ों में एक व्यक्ति भी पापरहित नहीं की प्रार्थना पर जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने संक्षेप में प्रायश्चित्तों देखते हैं। यहाँ पेच्छामो क्रिया ग्रन्थकार द्वारा स्वयं देखे जाने की का वर्णन करने हेतु जीतकल्प की रचना की। यहाँ कल्प, ओर इंगित करती है। व्यवहार शब्द का मूलसूत्र से तात्पर्य न होकर उसके भाष्य की थाष्य का रचनाकाल ओर संकेत होना चाहिए क्योंकि मूल ग्रन्थ परिमाण में इतने बृहद् नहीं हैं। दूसरी बात व्यवहारभाष्य की प्रायश्चित्त संबंधी भाष्यकार संघदासगणि का समय भी विवादास्पद है। अभी अनेक गाथाएँ जीतकल्प में अक्षरशः उदधत हैं। जैसे-- तक इस दिशा में विद्वानों ने विशेष ऊहापोह नहीं किया है। जीतकल्प व्यभा. जीतकल्प व्यभा. संघदासगणि आचार्य जिनभद्र से पूर्ववर्ती हैं। इस मत की पुष्टि । में अनेक हेतु प्रस्तुत किए जा सकते हैं-- ११० २२ ११४ जिनभद्रगणि के विशेषणवती ग्रन्थ में निम्न गाथा मिलती है १११ ३१,३२ तु. १०,११ सीहो चेव सुदाढो, जं रायगिहम्मि कविलबडुओ त्ति। निशीथभाष्य जिनभद्रगणि से पूर्व संकलित हो चुका था सीसइ ववहारे गोयमोवसमिओ स णिक्खंतो॥ इसका एक प्रमाण यह है कि निभा. में प्रमाद-प्रतिसेवना के व्यवहार भाष्य में इसकी संवादी गाथा इस प्रकार मिलती है सन्दर्भ में निद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। स्त्यानर्द्धि निद्रा के सीहो तिविट्ठ निहतो, भमिउं रायगिह कविलबडुग त्ति। उदाहरण के रूप में निभा. (१३५) में 'पोग्गल मोयग दंते' गाथा जिणवीरकहणमणुवसम गोतमोवसम दिक्खाय।' मिलती है। यह गाथा विशेषावश्यक भाष्य (२३५) में भी है। लेकिन वहाँ स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि व्यञ्जनावग्रह के प्रसंग विशेषणवती में 'ववहारे' शब्द निश्चित रूप से में विशेषावश्यक-भाष्यकार ने यह गाथा निभा. से उद्धृत की है। व्यवहारभाष्य के लिए प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि मूलसूत्र में इस विभा में यह गाथा प्रक्षिप्त सी लगती है। कुछ अंतर के साथ यह कथा का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य गाथा वृभा. (५०१७) में भी मिलती है। जिनभद्रगणि के समक्ष व्यवहारभाष्य था। पंडित दलसुख भाई मालवणिया ने जिनभद्र का समय विशेषावश्यकभाष्य की रचना व्यवहारभाष्य के पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी सिद्ध किया है। अत: भाष्यकार संघदासगणि हुई इसका एक प्रबल हेतु यह है कि बृहत्कल्प एवं व्यवहारभाष्य का समय पाँचवीं, छठी शताब्दी होना चाहिए। कर्त्ता के समक्ष यदि विशेषावश्यक भाष्य होता तो वे अवश्य विशेषावश्यकभाष्य की गाथाओं को अपने ग्रन्थ में सम्मिलित भाष्यग्रन्थों का रचनाकाल चौथी से छठी शताब्दी तक ही करते, क्योंकि वह एक आकरग्रंथ है, जिसमें अनेक विषयों का होना चाहिए। यदि भाष्य का रचनाकाल सातवीं शताब्दी माना सांगोपांग वर्णन प्राप्त है। जबकि व्यभा. एवं वभा. में अन्य जाए तो आगे के व्याख्याग्रन्थों के काल-निर्धारण में अनेक भाष्य पंचकल्प, निशीथ आदि की सैकडों गाथाएँ संवादी हैं। विसंगतियाँ उत्पन्न होती हैं। प्राचीनकाल में आज की भाँति मद्रण व्यवहारभाष्य की मणपरमोधिपुलाए गाथा विभा. में मिलती है। की व्यवस्था नहीं थी, अतः हस्तलिखति किसी भी ग्रन्थ को। वह व्यवहारभाष्य की गाथा है और विशेषावश्यकभाष्य के कर्ता प्रसिद्ध होने में कम से कम एक शताब्दी का समय तो लग ही Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211599
Book TitleBhashyakar Ek Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKusumpragyashreeji
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size666 KB
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