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प्रेमलता शर्मा
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स्रवणशक्ति मर्यादित है, अान्दोलनों की कुछ न्यूनतम और अधिकतम सीमा के भीतर ही मनुष्य का श्रोत्र काम करता है । इस मर्यादा के बाहर असीम क्षेत्र है किन्तु वह मनुष्य के लिये अगम माना जाता है। २-वाहक माध्यम के सम्बन्ध में । ध्वनिविज्ञान द्वारा प्रतिपाद्य ध्वनि पृथ्वी (Solid) जल (Liquid) अथवा वायु (gas) के माध्यम के बिना चल नहीं सकती। वाहनहीन आन्दोलन श्रव्य नहीं होता और वाहन हीनता शून्य (Vacuum) में ही हो सकती है। भारतीय दर्शन के अनुसार सपूर्ण शून्यता असंभव है क्योंकि तथाकथित शून्यता में भी शक्ति का बहुत प्रबल और सूक्ष्म रूप निहित रहता है। हमारे दर्शन में प्राकाश अथवा व्योम 'शून्य' में ही रहता है। वह सूक्ष्मतम भूत है जो सारे विश्व में व्याप्त है तथा जो Solid, Liquid तथा gas से भी सूक्ष्म है । ३-ध्वनि का लय कहाँ होता है इस का कोई उत्तर ध्वनि विज्ञान के पास नहीं है। विज्ञान अधिक से अधिक यही कह सकता है कि ध्वनि की शक्ति (energy) किसी अन्य शक्ति में परिवर्तित हो गई, किन्तु वह परिवर्तन कैसे कब और किस रूप में होता है इन प्रश्नों का कोई उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। भारतीय दर्शन के अनुसार ध्वनि का उदय और लय आकाश या व्योम में ही है, और उसी में सब ध्वनियाँ अमर रूप में संगृहीत रहती हैं । इसी सूक्ष्म व्योम के अनुसन्धान से परब्रह्म की प्राप्ति की सुगमता ही मार्ग संगीत का आधार है। इस अनुसन्धान के लिये नाद का माध्यम सर्वाधिक सुलभ माना गया है। इसी लिये संगीत को नादयोग कहा गया है। किन्तु इस अनुसन्धान के अभाव में संगीत साधना एक लौकिक कर्म मात्र है। इस नादअनुसन्धान के प्रसंग में निम्नलिखित उद्धरण विशेष उपयोगी होगा।
" हमारे समस्त नादोच्चारण का कोई एक आधार अवश्य है, और वह है ब्रह्माकाश में ज्ञानमय पो रूप मूल स्पन्द । यह मूल स्पन्द अपने को नाद अथवा ध्वनि के रूप में व्यक्त कर रहा है । अवश्य ही यह ध्वनि साधारण श्रव्य ध्वनि नहीं है। यह ध्वनि रूपा सुर-धुनी ध्र वा व सनातनी है । 'तद विष्णोः परमं पदम्'-यह है इस ध्वनि का पराभाव । ब्रह्मलोक में जो कुण्ठाहीन दिव्य अनुभूति है, वह है पश्यन्ती भावा हर के जटा जाल में अवगुठित होने पर मध्यमा और अन्त में भगीरथ के शंख-निनाद से गोमुख से निःसृता होने पर वैखरी होती है। हमारा सब वाग्व्यवहार रस ध्र व-धारा के वक्ष: स्थल पर वीचिवत् उठ कर पुनः उसी में लीन हो जाता है, इसलिये साधक को मूल-स्पन्द रूपा उस ध्वनि-सुरधुनी ध्र वा का सन्धान करना होता है।"
(स्वामी प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती कृत जपसूत्रम्, भाग २, परिशिष्ट, श्लोक ४-१०)
देशी का सम्बन्ध वैखरी से ही है। किन्तु मार्ग में मध्यमा पश्यन्ती और परा का क्रमशः अनुसन्धान आवश्यक हैं। इस प्रसंग में एक भ्रान्त धारणा का निराकरण आवश्यक है। कुछ लोगों का यह विचार है कि मार्ग-संगीत का माध्यम अनाहत नाद है। किन्तु वास्तव में मार्ग उसी संगीत की संज्ञा है जो इन्द्रियजन्य व्यापार के स्तर पर पाहत नाद को पालम्बन बना कर निःश्रेयस् प्राप्ति में समर्थ होता है। यदि ऐसा न होता तो तो संगीत शास्त्र के अन्तर्गत उसका वर्णन ही न हो पाता। फिर तो वह अनाहत नाद की भांति केवल योग-शास्त्र का ही विषय रह जाता ।
- उपसंहार में कुछ विषयों का संकेत-मात्र प्रस्तुत किया जाता है क्योंकि स्थानाभाव से उनका प्रतिपादन नहीं किया जा सका है।
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