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________________ पर्युषण के पर्यायवाची अन्य नाम 'पर्युषण' के अनेक पर्यायवाची नामों का उल्लेख निशीथभाष्य ( 3139) तथा कल्पसूत्र की विभिन्न टीकाओं में उपलब्ध होता है। इसके कुछ प्रसिद्ध पर्यायवाची शब्द निम्न हैं - • • • • • • . पज्जोसवणा (पर्युपशमना), परिवसणा (परिवसना), पज्जूसणो (पर्युषण), वासावास (वर्षावास) पागइया (प्राकृतिक), पढमसमोसरण (प्रथम समवसरण), परियायठवणा (पर्यायस्थापना), • ठवणा (स्थापना), · जोवग्ग (ज्येष्ठावग्रह ) । इसके अतिरिक्त वर्तमान में अष्टाह्निक पर्व या अठाई महोत्सव नाम भी प्रचलित है। इन पर्यायवाची नामों से हमें पर्युषण के वास्तविक स्वरूप का भी बोध हो जाता है। पज्जोसवणा (पर्युशमना) पज्जोसमणा शब्द की व्युत्पत्ति, परि + उपशमन से भी की जाती है। परि अर्थात् पूरी तरह से, उपशमन अर्थात् उपशान्त करना। पर्युषण पर्व में कषायों की अथवा राग-द्वेष की वृत्तियों को सम्पूर्ण रूप से क्षय करने हेतु साधना की जाती है, इसलिए उसे पज्जोसमणा (पर्युपशमना ) कहा जाता है। पज्जोसवणा/परिवसणा (परिवसना ) कुछ आचार्य पज्जोसवण की व्युत्पत्ति परि + उषण से भी करते हैं। उषण धातु वस् अर्थ में भी प्रयुक्त होती है - उषणं = वसनं । इस प्रकार पज्जोसवण का अर्थ होगा परिवसना अर्थात् विशेष रूप से निवास करना। पर्युषण में एक स्थान पर चार मास के लिए मुनिगण स्थित रहते हैं, इसलिए इसे परिवसना कहा जाता है। परिवसना का आध्यात्मिक अर्थ पूरी तरह आत्मा के निकट रहना भी है। 'परि' अर्थात् सर्व प्रकार से और 'वसना' अर्थात् रहना- इस प्रकार पूरी तरह से आत्मा में निवास करना या रहना परिवसना है, जो कि पर्युषण के आध्यात्मिक स्वरूप को स्पष्ट करता है। इस पर्व की साधना में साधक बहिर्मुखता का परित्याग कर तथा विषय-वासनाओं से मुँह मोड़कर आत्मसाधना में लीन रहता है। - पज्जूसण (पर्युषण) 'परि' उपसर्ग और 'उष्' धातु के योग से भी पर्युषण शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है। उष् धातु दहन अर्थ की भी सूचक है। इस व्याख्या की दृष्टि से इसका अर्थ होता है सम्पूर्ण रूप से दग्ध करना अथवा जलना । इस पर्व में साधना एवं तपश्चर्या के द्वारा कर्म रूपी मल को अथवा कषाय ॰ परि-सामस्त्येन उषणं-वसनं पर्युषणा- कल्पसूत्र, सुविधिनी टीका, विनयविजयोपाध्याय, प्रका० - हीरालाल हंसराज, जामनगर 1939, q. 1721 Page | 4
SR No.211332
Book TitleParyushan parva Ek Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle, Pious Days, & Paryushan
File Size905 KB
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