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________________ ४६ : सरस्वती-वरदपुत्र पं० बंशीधर व्याकरणाचार्य अभिनन्दन-ग्रन्य न रहकर नियमसे निश्चयरूप औपशमिक या क्षायिक सम्यदर्शन ही रहा करता है। इसमें भी इतनी विशेषता है कि उपशश्रेणीपर आरूढ़ होनेवाले जीवके निश्चयरूप औपशमिक और क्षायिक दोनों सम्यग्दर्शनोंमेंसे कोई एक सम्यग्दर्शन रह सकता है । लेकिन क्षपकश्रेणीपर आरूढ़ होनेवाले जीवके निश्चयरूप क्षायिक सम्यग्दर्शन ही रहता है, औपशमिक सम्यग्दर्शन नहीं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आठवें गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तकके जीव या तो औपशमिकसम्यग्दृष्टिके रूपमें निश्चयसम्यग्दष्टि रहा करते हैं या फिर क्षायिकसम्यग्दृष्टि के रूप में निश्चयसम्यग्दृष्टि रहा करते हैं। इन गुणस्थानोंमें रहनेवाला कोई भी जीव कभी भी क्षायोपमिक सम्यग्दृष्टिके रूपमें व्यवहारसम्यग्दृष्टि नहीं रहता है । इसी प्रकार बारहवें गुणस्थानमें और इससे आगेके गुणस्थानोंमें रहनेवाला कोई भी जीव केवल क्षायिकसम्यग्दृष्टिके रूपमें ही निश्चयसम्यग रहा करता है। इसी प्रकार मोक्षमार्गके अंगभूत सम्यग्ज्ञानका प्रारम्भ भी चतुर्थ गुणस्थानसे ही होता है। इसमें भी चुतर्थगुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक तो प्रत्येक जीवमें क्षायोपशमिक सम्यग्ज्ञानके रूपमें व्यवहारसम्यग्ज्ञान ही रहा करता है निश्चयसम्यग्ज्ञान महीं, तथा इसके आगे तेरहवें और चौदहवें गणस्थानोंमें क्षायिकज्ञानके रूपमें निश्चयसम्यग्ज्ञान ही रहा करता है, व्यवहार सम्यग्ज्ञान नहीं। कारण कि तेरहवें गुणस्थानसे पूर्व बारहवें गुणस्थानके अन्त समयमें मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण इन पांचों ही ज्ञानावरणोंका एक साथ सर्वथा क्षय हो जानेके कारण क्षायोपशमिक ज्ञानोंका तेरहवें गणस्थानके प्रथम समयमें सर्वथा अभाव हो जाता है। यद्यपि भव्य तथा अभव्यके भेदसे सहित एकेन्द्रियादिक समस्त संसारी जीवोंमें अनादिकालसे मतिज्ञान, श्रुतज्ञानके रूपमें क्षायोपशमिक ज्ञानोंका नियमसे सद्भाव पाया जाता है। परन्तु उन ज्ञानोंमें व्यवहारसम्यग्ज्ञानका रूप तब तक नहीं आता जब तक जीवमें सम्यग्दर्शनका प्रादुर्भाव नहीं हो जाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि एक तो संज्ञीपंचेन्द्रिय जीवका क्षायोपशमिक ज्ञान ही व्यवहारसम्यग्ज्ञानका रूप धारण कर सकता है, एकेन्द्रियसे लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तकके जीवोंका क्षायोपशमिक ज्ञान कदापि व्यवहारसम्यग्ज्ञानका रूप नहीं धारण करता है । दसरे. भव्यजीवोंका क्षायोपशमिक ज्ञान ही व्यवहारसम्यग्ज्ञानका रूप धारण कर सकता है, अभव्य जीवोंका नहीं। और तोसरे संज्ञीपंचेन्द्रिय भव्य जीवोंका क्षायोपशमिक ज्ञान भी सम्यग्दर्शनको तरह चतुर्थगुणस्थानमें ही व्यवहारसम्यग्ज्ञानका रूप धारण करता है, इससे पूर्वके गणस्थानोंमें नहीं, क्योंकि वह सम्यग्दर्शनके सदभावमें सम्यग्ज्ञानरूपताको प्राप्त होता है। मोक्षमार्गके अंगभूत व्यवहार तथा निश्चय दोनों ही प्रकारके सम्यकचारित्रोंके विषयमें आगमकी व्यवस्था यह है कि एकदेश क्षायोपशमिक सम्यक् चारित्रके रूपमें व्यवहारसम्यकचारित्रका प्रारम्भ पंचम गणस्थानसे ही होता है, इससे पूर्वके चारों गुणस्थानोंमें तो असंयत भाव ही रहा करता है। कारण कि इन चारों गणस्थानोंमें अप्रत्याख्यानावरण कषायके उदयका अभाव नहीं होता है। यही क्षायोपशमिकरूपताको प्राप्त व्यवहारसम्यक्-चारित्र संज्वलनकषायके उदयके सद्भाव तथा प्रत्याख्यानावरणकषायके उदयके अभावमें षष्ठगुणस्थानमें सर्वदेशात्मक महाव्रतका रूप धारण कर लेता है तथा आगे संज्वलन कषाय व १. छहढाला, ४-१ । २-३. तदियकसायुदयेण य विरदाविरदो गुणो हवे जुगवं । विदियकसायदयेण य असंजमो होदि णियमेण ॥ गो० जी०४६८। ४. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा ४६५ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211283
Book TitleNischay aur Vyavahar Moksh Marg
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages20
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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