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________________ २१६ आ. शांतिसागरजी जन्मशताब्दि स्मृतिग्रंथ होने से वह उनके लिए उपयोगी है। परन्तु जब वे अन्तःकरण में पर के सम्बन्ध से रहित शुद्ध चैतन्यरूप परमार्थ का दर्शन करने लगते हैं तब उन्हें उक्त व्यवहारनय कुछ भी नहीं रहता---वह उस समय निरर्थक हो जाता है (४-५)। प्रस्तुत तत्त्वार्थसार में ये आठ अधिकार हैं--१ सप्ततत्त्वपीठिका, २ जीवतत्त्ववर्णन, ३ अजीवतत्त्ववर्णन, ४ आस्रवतत्त्ववर्णन, ५ बन्धतत्त्ववर्णन, ६ संवरतत्त्ववर्णन, ७ निर्जरातत्त्ववर्णन और ८ मोक्षतत्त्ववर्णन । इनमें श्लोकों का प्रमाण कमशः इस प्रकार है-५४, २३८, ७७, १०५, ५४, ५२, ६० और ५५ । इसके अतिरिक्त अन्त में २१ श्लोकों के द्वारा सब का उपसंहार किया गया है । - १. सप्ततत्त्वपीठिका-इस प्रकरण में सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रस्वरूप मोक्षमार्ग को युक्ति और आगम से सुनिश्चित बतलाते हुए उन तीनों के लक्षण इस प्रकार कहे गए हैं -- तत्त्वार्थश्रद्धान का नाम सम्यग्दर्शन, तत्त्वार्थावबोध का नाम सम्यग्ज्ञान और वस्तुस्वरूप को जानकर उसके विषय में उपेक्षा करना--- न उसमें इष्ट मान कर राग करना और न अनिष्ट समझ कर द्वेष करना, इसका नाम सम्यक्चारित्र है चूंकि उक्त श्रद्धान, अधिगम और उपेक्षा के विषय भतजीवादि तत्व हैं, अत एव जो मोक्षमार्ग को जानना चाहते हैं उनसे प्रथमतः उन जीवादि तत्त्वार्थो के जानने की प्रेरणा की गई है। आगे उन जीवादि तत्त्वार्थों का नामनिर्देश करते हुए उनके कथन का प्रयोजन यह बतलाया है कि जीव उपादेय और अजीव हेय है। इस हेयभूत अजीव (कर्म) के जीव में उपादानका कारण आस्रव है तथा उस हेय के ग्रहण का नाम बन्ध है। संवर और निर्जरा ये दोनों उस हेय की हानि के कारण हैं—नवीन हेय का रोकनेवाला संवर और पुरातन संचित उस हेय के जीव से पृथक् करने का कारण निर्जरा है। जीव का उस हेय से छुटकारा पा जाने का नाम मोक्ष है। इस प्रकार आत्मा के प्रयोजन को लक्ष्य में रखते हुए संक्षेप में उक्त जीवादि सात तत्त्वार्थों का स्वरूप यहां बहुत सुन्दरता के साथ बतलाया गया है। ___ तत्पश्चात् नामादि निक्षेपों के स्वरूप को बतलाकर भेदप्रभेदों के साथ प्रमाण और नय का विवेचन किया गया है। अन्त में निर्देशादि और सत्-संख्या आदि अन्य भी जो तत्त्व के जानने के उपाय हैं उनका भी निर्देश करके पीठिका को समाप्त किया गया है । २. जीवतत्त्वप्ररूपणा-तत्त्वार्थसूत्र में जीवों की जो प्ररूपणा द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ इन तीन अध्यायों में की गई हैं वह सभी प्ररूपणा यहां कुछ विशेषताओं के साथ प्रकृत अधिकार में की गई है। सर्वप्रथम यहां यह बतलाया है कि सात तत्त्वों में जिस तत्त्व का स्वतत्त्व-निजस्वरूप-अन्य अजीवादि में न पाये जानेवाले औपशमिकादि पांच असाधारण भाव हैं उसका नाम जीव है। इस प्रकार जीव के स्वरूप का निर्देश करते हुए उक्त पांच भावों के स्वरूप और उनके पृथक् पृथक् भेदों का विवेचन किया गया है । आगे कहा गया है कि जीवका लक्षण उपयोग है और वह उससे अभिन्न है। कर्म से सम्बद्ध होते हुए भी जीवकी अभिव्यक्ति इसी उपयोग के द्वारा की जाती है। यह उपयोग साकार और निराकार के भेद से दो प्रकार का है। जो विशेषता के साथ वस्तुको ग्रहण करता है वह साकार और जो बिना विशेषता Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211094
Book TitleTattvarthasara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherZ_Acharya_Shantisagar_Janma_Shatabdi_Mahotsav_Smruti_Granth_012022.pdf
Publication Year
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle, Nine Tattvas, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size723 KB
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