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________________ ३ / धर्म और सिद्धान्त : १२३ यद्यपि मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान एवं व्यवहार सम्यग्ज्ञान ये सभी यथायोग्य नोकर्मभूत हृदय और मस्तिष्कके सहारेपर होने वाले जीवको भाववती शक्तिके ही परिणमन हैं, परन्तु वे चरणानुयोगकी प्रक्रियामें ही अन्तर्भूत होते हैं। उक्त विवेचनसे यह भी ज्ञात होगा है कि मिथ्याचारित्र और अविरतिरूप दोनों क्रियाव्यापारोंमें अन्तर है, क्योंकि जहाँ मिथ्याचारित्र, मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान पूर्वक होता है वहाँ अविरति व्यवहारसम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्ज्ञानपूर्वक होती है । जहाँ मिथ्याचारित्र आसक्तिवश होनेके कारण संकल्पी पाप माना जाता है वहाँ अविरति अशक्तिवश होनेके कारण आरम्भी पाप माना जाता है। मिथ्याचारित्र और अविरतिके अन्तरको इसप्रकार भी समझा जा सकता है कि मिथ्याचारित्रका सद्भाव प्रथमगुणस्थानमें ही रहता है क्योंकि वह मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञानपूर्वक ही होता है। इसके विपरीत अविरतिका सद्भाव व्यवहारसम्यग्दर्शन और व्यवहारसम्यग्ज्ञानपूर्वक होनेके कारण प्रथम गुणस्थानसे लेकर चतुर्थ गुणस्थान तकके जीवोंमें आगम द्वारा स्वीकार किया गया है। इन सब बातोंको ध्यानमें रखकर ही ऊपर बन्धके कारणोंमें मिथ्याचारित्र और अविरतिको पृथक्पृथक् रूपमें ही सम्मिलत किया गया है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि कर्मबन्धमें कारणभूत मिथ्याचारित्र, अविरति, एकदेशअविरति और २८ मूलगुणोंमें प्रवृत्तिरूप सभी क्रियाव्यापार नोकर्मभूत मन, वचन और कायके अवलम्बनसे होनेवाले जीवकी क्रियावतीशक्तिके परिणमनोंके रूपमे योग ही है। परन्तु ये सभी चारित्रमोहनीयकर्मकी उस-उस प्रकृतिके उदयमें यथायोग्य नोकर्मोके अवलम्बनसे होनेवाले जीवकी भाववतीशक्तिके परिणमन स्वरूप राग और द्वेषसे प्रभावित रहते हैं एवं जबतक उनका प्रभाव उक्त योगोंपर बना रहता है तबतक उन योगोंके आधारपर कर्मोंके प्रकृतिबन्ध ओर प्रदेशबन्धके साथ स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध नियमसे होते रहते हैं। __ यतः ११वें, १२वें और १३वें गुणस्थानोंमें केवल स्वतन्त्र योग ही बन्धका कारण शेष रह जाता है, अतः उससे कर्मोंके केवल प्रकृति और प्रदेशबन्ध ही होते हैं, स्थिति और अनुभागबन्ध नहीं होते। यद्यपि बन्धके कारणोंमें मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञानका ही समावेश है, परन्तु पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि वे दोनों कोंके बन्धमें साक्षात्कारण नहीं होकर परंपरया ही कारण होते हैं, क्योंकि उनकी बन्धकारणता बन्धके कारणभूत मिथ्याचारित्रका उत्पादन करना ही है। दूसरी बात यह है कि मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान ये दोनों जीवको भाववतोशक्तिके परिणमन है, इसलिए इनका कर्मबन्धके मूलकारणभत जीवकी क्रियावतीशक्तिके परिणमन स्वरूप योगमें अन्तर्भाव नहीं होता है। बन्धका साक्षात्कारण जो मिथ्याचारित्र है वह मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञानपूर्वक ही होता है और उसका सद्भाव प्रथम गुणस्थानमें ही रहता है, आगेके गुणस्थानोंमें नहीं। बन्धके कारणोंमें जो अविरति और शेष एकदेश अविरति एवं २८ मूलगुणोंमें प्रवृत्तिरूप प्रमाद सम्मिलित है वे भी प्रथमगुणस्थानमें पाये जा सकते है, परन्तु वह अविरति जीवन-संरक्षणमें उपयोगी आरम्भी पापोंके रूपमें मानी जा सकती है, जीवनके लिए अनुपयोगी और हानिकर अनैतिक आचरणरूप संकल्पी पापोंके रूपमें नहीं, क्योंकि अनैतिक आचरणरूप संकल्पी पापोंका अन्तर्भाव मिथ्याचारित्रमें ही होता है। ___अविरति तृतीय ओर चतुर्थ दोनों गुणस्थानोंमें समानरूपसे पायी जाती है, परन्तु तृतीय गुणस्थानमें पायी जानेवाली अविरतिमें यह विशेषता रहती है कि वहाँ उसका सद्भाव दर्शनमोहनीयकर्मके भेद सम्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211049
Book TitleJainagam me Karmbandh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Karma
File Size816 KB
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