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________________ ३ धर्म और सिद्धान्त : ११७ प्रत्याख्यानावरण कषायके क्षयोपशम और संज्वलनकषायके तीव्र उदयमें जीवकी भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है वह षष्ठ प्रमत्तविरत गुणस्थान है । औपशमिक, क्षयोपशमिक या क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवमें जब संज्वलनकषायका सामान्यरूपसे मंदोदय होता है तब जीवकी भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है तब वह सप्तम स्वस्थानाप्रमत्त गुणस्थान कहलाता है तथा औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवमें जब संज्वलन कषायका विशेषरूपसे मंदोदय होता है तब वह सातिशय-अप्रमत्त गुणस्थान कहलाता है। वह सातिशय-अप्रमत्त गुणस्थानवी जीव नियमसे अधःकरणरूप आत्मविशुद्धिको प्राप्त रहता है। संज्वलनकषायके मन्दतर उदयमें औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवकी भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है वह अष्टम अपूर्वकरण गुणस्थान है । यह जीव नियमसे अपूर्वकरणरूप आत्मविशुद्धिको प्राप्त रहता है। सज्वल संज्वलन कषायके मन्दतम उदयमें औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दष्टि जीवको भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है वह नवम अनिवृत्तिकरण गुणस्थान है । इस अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें जीव अकषायवेदीनीय प्रकृतियोंके साथ अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायोंको सम्पूर्ण प्रकृतियोंका यथायोग्य उपशम या क्षय करता है तथा संज्वलनकषायकी क्रोध, मान, माया प्रकृतियोंका भी यथायोग्य उपशम या क्षय करता है एवं संज्वलन लोभप्रकृतिका कर्षण भी करता है। संज्वलनकषायकी सूक्ष्मताको प्राप्त लोभ प्रकृतिका उदय रहते हुए जीवको भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है वह दशम सूक्ष्मलोभ गुणस्थान कहलाता है। दर्शनमोहनीयकर्मकी ३ और अनन्तानुबन्धी कषायकी ४ इन ७ प्रकृतियोंके उपशम अथवा क्षय तथा चारित्रमोहनीयकर्मकी शेष सभी प्रकृतियोंके उपशममें जीवकी भाववतीशक्ति जो परिणमन होता है वह ११वां उपशान्तमोह गुणस्थान है। सम्पूर्ण मोहनीयकर्मके क्षयमें जीवकी भाववतीशक्तिका जो परिणमन होता है वह १२वाँ क्षीणमोह गुणस्थान है। यतः १२वाँ गुणस्थान सम्पूर्ण मोहनीयकर्मका क्षय होनेपर होता है और यह स्थिति जीवको १३वें और १४वें गुणस्थानोंमें भी रहती है, अतः इस आधारपर इन तीनों गुणस्थानोंमें समानता पाई जाती है तथापि १२वें गुणस्थानवर्ती जीवको अपेक्षा १३वें और १४वें गुणस्थानवी जीवोंमें यह विशेषता पाई जाती है कि उनमें ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीनों कर्मोका सर्वथा क्षय होजानेके कारण जीवकी भाववतीशक्तिके परिणमनस्वरूप केवलज्ञान आदि गुणोंका विकास भी पाया जाता है। इसी प्रकार १३वें और १४वें गुणस्थानवर्ती जोवोंमें भी यह विशेषता पाई जाती है कि जहाँ १३वें गुणस्थानवी जीवोंमें क्रियाशील पौद्गलिक मन, बोलनेके स्थानभूत वचन और कायके अवलम्बनसे उन जीवोंकी क्रियावतीशक्तिके परिणमनस्वरूप हलन-चलन क्रियारूप योग पाया जाता है वहाँ १४वें गुणस्थानवर्ती जीवोंमें पौद्गलिक मन, वचन और कायका सद्भाव रहते हुए भी उनके निष्क्रिय हो जानेसे योगका सर्वथा अभाव हो जाता है। इस प्रकार १४ गुणस्थानोंकी व्यवस्था निराबाध हो जाती है। .. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211049
Book TitleJainagam me Karmbandh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Karma
File Size816 KB
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