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________________ ३९७ जैन धर्म में मुक्ति की अवधारणा : एक तुलनात्मक अध्ययन कृत्स्न कर्मक्षयान् मोक्षः, तत्वार्थसूत्र, विवे०, पं० सुखलाल संधवी, २०. सुखमात्यन्तिकं यत्ताबुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। -वही, ६/२१। प्रका०, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी १९७६, १०१। २१. इनसाइक्लोपेडिया आफ इथिक्स एण्ड रिलीजन, संपा०, जेम्स २. बन्ध वियोगो मोक्ष:-अभिधानराजेन्द्रकोष, श्री विजय राजेन्द्र सूरि हैस्टिंग, प्रका०, टी०एण्ड टी० क्लार्क, एडिनबर्ग। जी, रतलाम, खण्ड ६, पृ० ४३१ २२. आस्पेक्टस ऑफ महायान इन रिलेशन टु हीनयान। ३. मुक्खो जीवस्स शुदद्ध रूचस्स-वही, खण्ड ६, पृ० ४३१ २३. द्रव्यं सत् प्रतिसंख्या निरोधः सत्यचतुष्टय-निर्देश-निर्द्धिष्टत्वात्, ४. तुलना कीजिए-(अ) आत्म मीमांसा (दलसुखभाई), पृ०६६-६७ मार्ग सत्येव इति वैभाषिकाः। -यशोमित्र-अभिधर्मकोष व्याख्या, (ब) ममेति वध्यते जन्तुर्नममेति प्रमुच्यते। - गरुड़ पुराण। पृ० १७। अव्वावाहं अवत्थाणं-अभिधानराजेन्द्रकोष, खण्ड ६, पृ०४३१। २४. बुद्धिस्ट निर्वाण, पृ० २७। ६. नियमसार, अनु० अगरसेन, अजिताश्रम, लखनऊ, १९६३, २५. आस्पेक्ट्स ऑफ महायान इन रिलेशन टु हीनयान, पृ० १६२ १७६-१७७। २६. सेंट्रल फिलॉसफी ऑफ बुद्धिज्म, टी०आर०वी० मूर्ति, प्रका० जॉर्ज, ७. विज्जदि केवलणाणं, केवलसोक्खं च केवलविरियं। एलेन एण्ड टी०क्लार्क, एडिनबर्ग १९५५, पृष्ठ १२९, केवलदिट्ठि अमुत्तं अत्थित्तं सप्पदेसत ।। -वही, १८१ पृ० २७२-७३। कुछ विद्वानों ने अगुरुलघुत्व का अर्थ न हल्का न भारी ऐसा भी २७. बुद्धिस्ट फिलासफी ऑफ युनिवर्सल फ्लक्स, सत्कारी मुखर्जी, किया है। प्रका०, कलकत्ता विश्वविद्यालय प्रेस १९३५, पृ० २५२। ९. प्रवचनसारोद्धार, संपा०, नेमिचन्द्रसूरि, निर्णय सागर प्रेस, बबई, २८. ए कम्परेटिव स्टेडी ऑफ दी कानसेप्ट ऑफ लिबरेशन इन इंडियन १९२२, द्वार २७६, गाथा १५९३-१५९४। फिलॉसफी, डॉ. अशोक कुमार लाड, प्रका० गिरधारी लाल १०. सदासिव सखो मक्कडि बुद्धौ णैयाइयो य वेसेसी। केशवदास, बुरहानपुर, पृ०६९।। ईसर मडलि दंसण विदूसणटुं कयं एदं ।। -गोम्मटसार (नेमिचन्द्र) (ब) बौद्ध दर्शन मीमांसा, आचार्य बलदेव उपाध्याय, प्रका०, संपा०, पं० खूबचन्द्र जैन, प्रका०, परमश्रुत प्रभावक मण्डल, चौखम्बा विद्या भवन वाराणसी, १९७८, पृ० १४७। आगास, वि०सं० २०२२। २९. लंकावतारसूत्र, संपा०, श्री परशुराम शर्मा, मिथिला विद्यापीठ, से न दीहे, न हस्से, न वट्टे, न तंसे, न चउरंसे, न परिमंडले, न दरभंगा १९६३, २/६२। । किण्हे, न नीले, न लोहिते, न हालिद्दे, न सुकिल्ले, न सुरभिगन्धे, ३०. क्लेशज्ञेयावरण प्रहाणभपि मोक्ष सर्वज्ञात्वाघिगमार्थम।-स्थिरमति न दुब्भिगन्धे, न तिते, न कडुए, न कसाए, न अंबिले, न महुरे, त्रिशिंका विज्ञप्ति भाष्य, पृ० १५, उद्धृत-आचार्य बलदेव उपाध्याय, न कक्खड़े, न मउए, न गुरुए, न लहुए, न सीए, न उण्हे, न निद्धे, बौद्धदर्शनमीमांसा, पृष्ठ १३२। न लुक्खे, न काऊ, न रूहे, न संगे, न इत्थी, न पुरिसे, न अनहा, ३१. अचित्तोऽनुपलम्भो सो ज्ञानं लोकोत्तरं च तत्। आश्रयस्यपरावृतिद्विघासे न सद्दे, न रूवे, न गंधे, न रसे, न फासे। -आचारांगसूत्र, दौष्ठुल्य हानितः। -त्रिशिंका २९ संपा०, मधुकर मुनि, प्रका०, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, ३२. स एवानास्त्रवो धातुरचिन्त्यः कुशलो ध्रुवः।-त्रिशिंका ३० १९८०, १/५/६। 33. Acritical Survey of Indian Philosophy, Pub. - Motilal णवि दु:क्खं णवि सुक्खं णवि पीडा व विज्जदे बाहा । Banarasidas, Delhi, 1979, p. 109. णवि मरणं णवि जणणं तत्थेव य होई णिव्वाणं ।। ३४. बौद्ध दर्शन मीमांसा, पृष्ठ १२६-१३८। मोहो विम्हियो ण णिद्दाय। ३५. महायान सूत्रालंकार, सपां० एस०एस०बागची, प्रका० मिथिला त्थेव हवदि णिव्वाणं ।। -नियमसार, संपा० पं० परमेष्ठीदास विद्यापीठ, दरभंगा १९७०, ९/६० (महायान-शान्तिभिक्षु, पृष्ठ७३) न्यायतीर्थ, प्रका० दिग० जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट, जयपुर, १९८८, ३६. भावाभाव परामर्शक्षयो निर्वाणं उच्यते। -माध्यमिककारिकावृति, अनु० अगरसेन, अजिताश्रम, लखनऊ, १९६३, १७८-१७९। पृष्ठ ५२४। १३. मनसा सह-तैत्तरीय २/९ –मुण्डक ३/१/८ (उद्धृत दी सेंट्रल फिलासफी ऑफ बुद्धीज्म (टी. आर. वी. मूर्ति) पृष्ठ १४. यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। -गीता, गीताप्रेस, गोरखपुर, २७४। वि०सं० २०१८, १५/४। ३७. अप्रहीणमसम्प्राप्तमनुच्छिन्त्रमशाश्वतम्। १५. (अ) यं प्राप्य न निर्वतन्ते तद्धाम परमं मम। -वही, ८/२१। अनिरूद्धमनुत्पन्नमेतन्निर्वाणमुच्यते ।। -माध्यमिककारिकावृत्ति। (ब) यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। -वही, १५/६। पृ० ५२१, उद्धृत आचार्य बलदेव उपाध्याय, बौद्ध दर्शन मीमांसा, (स) मामुपेत्य पुर्नजन्म दुःखालयमशाश्वतम्। पृष्ठ १३३। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः। -वही, ८/१५। ३८. उदान अनु० जगदीश कश्यप, प्रका० महाबोधि सभा, सारनाथ १६. गीता-८/२०-२१ वाराणसी, ८/३ पृ० ११०-१११ (ऐसा ही वर्णन इतिवृत्तक १७. अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यत्ममुच्यते। -वही, ८/३। २/२/६ में भी है) १८. शान्तिं निर्वाणपरमां। -वही, ६/१५। ३९. धम्मपद, अनु० पं०राहुल सांकृत्यायन, प्रका०, बुद्ध विहार, १९. सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते। -वही, ६/२८ लखनऊ, २०३, २०४। १२. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211023
Book TitleJain Dharm me Mukti ki Avadharna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Nine Tattvas
File Size968 KB
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