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जैन धर्म में मुक्ति की अवधारणा : एक तुलनात्मक अध्ययन नहीं होता, प्रवृत्त नहीं होता।३१ वह अनावरण और आस्त्रवधातु है, को उच्छेद या शाश्वत भी नहीं कहा जा सकता अन्यथा शास्ता के लेकिन असंग केवल इस निषेधात्मक विवेचन से सन्तुष्ट नहीं होते मध्यम-मार्ग का उल्लंघन होगा और हम उच्छेदवाद या शाश्वतवाद की हैं, वे निर्वाण की अनिर्वचनीय एवं भावात्मक व्याख्या भी प्रस्तुत करते मिथ्या दृष्टि से ग्रसित होंगे। इसलिए माध्यमिक नय में निर्वाण भाव हैं। निर्वाण अचिन्त्य है, क्योंकि तर्क से उसे जाना नहीं जा सकता लेकिन और अभाव दोनों नहीं है। वह तो सर्व संकल्पनाओं का क्षय है, अचिन्त्य होते हुए भी वह कुशल है, शाश्वत है, सुख रूप है, विमुक्तकाय प्रपंचोपशमता है। है, और धर्माख्य है। ३२ इस प्रकार विज्ञानवादी मान्यता में निर्वाण की बौद्ध दार्शनिकों एवं वर्तमान युग के विद्वानों में बौद्ध दर्शन में अभावपरक और भावपरक व्याख्याओं के साथ-साथ उनकी अनिर्वचनीयता निर्वाण के स्वरूप को लेकर जो मतभेद दृष्टिगत होता है उसका मूल को भी स्वीकार किया गया है। वस्तुतः निर्वाण के अनिर्वचनीय स्वरूप कारण बुद्ध द्वारा निर्वाण का विविध दृष्टिकोणों के आधार पर विविध के विकास का श्रेय विज्ञानवाद और शून्यवाद को ही है। लंकावतारसूत्र ____ रूप से कथन किया जाना है। पाली-निकाय में निर्वाण के इन विविध में निर्वाण के अनिर्वचनीय स्वरूप का सर्वोच्च विकास देखा जा सकता स्वरूपों का विवेचन उपलब्ध होता है। उदान नामक एक लघु ग्रन्थ है। लंकावतारसूत्र के अनुसार निर्वाण विचार की कोटियों से परे है, में ही निर्वाण के इन विविध रूपों को देखा जा सकता है। फिर भी विज्ञानवादी निर्वाण को इस आधार पर नित्य माना जा सकता है कि निर्वाण लाभ से ज्ञान उत्पन्न होता है।
निर्वाण एक भावात्मक तथ्य है तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने पर विज्ञानवादी निर्वाण का इस सन्दर्भ में बुद्ध वचन इस प्रकार है- "भिक्षुओं! (निर्वाण) जैन विचारणा से निम्न अर्थों मे साम्य है-१. निर्वाण चेतना का अभाव अजात, अभूत, अकृत, असंस्कृत है। भिक्षुओं! यदि वह अजात, अभूत, नही है, वरन् विशुद्ध चेतना की अवस्था है। २. निर्वाण समस्त संकल्पों अकृत, असंस्कृत नहीं होता तो जात, भूत, कृत और संस्कृत का का क्षय है, वह चेतना की निर्विकल्पावस्था है। ३ निर्वाणावस्था में व्युपशम नहीं हो सकता। भिक्षुओं! क्योंकि वह अजात, अभूत, अकृत भी चैतन्य धारा सतत् प्रवाहमान रहती है (आत्मपरिणमीपन)। यद्यपि और असंस्कृत है इसलिए जात भूत, कृत और संस्कृत का व्युपशम डॉ०चन्द्रधर शर्मा ने आलय विज्ञान को अपरिवर्तनीय या कूटस्थ माना जाना जाता है।३८ धम्मपद में निर्वाण को परम सुख,३९ अच्युत स्थान है।३३ लेकिन आदरणीय बलदेव उपाध्याय उसे प्रवाहमान या और अमृत पद कहा गया है जिसे प्राप्त कर लेने पर न च्युति का परिवर्तनशील ही मानते हैं।३४ ४. निर्वाणावस्था सर्वज्ञता की अवस्था भय होता है, न शोक होता है। उसे शान्त संसारोपशम एवं सुख है। जैन विचारणा के अनुसार उस अवस्था में केवलज्ञान और केवल पद भी कहा गया है। इतिवुत्तक में कहा गया है- वह ध्रुव, न दर्शन है। असंग ने महायान सूत्रालंकार में धर्मकाय को जो कि निर्वाण उत्पन्न होने वाला है, शोक और राग रहित है, सभी दु:खों का वहाँ की पर्यायवाची है, स्वाभाविक काय कहा है।३५ जैन विचारणा में भी निरोध हो जाता है, वहाँ संस्कारों की शान्ति एवं सुख है। आचार्य मोक्ष को स्वभाव-दशा कहा जाता है। स्वाभाविक काय और स्वभाव-दशा बुद्धघोष निर्वाण की भावात्मकता का समर्थन करते हुए विशुद्धिमग्ग अनेक अर्थों में अर्थ साम्य रखते हैं।
में लिखते हैं—निर्वाण नहीं है, ऐसा नहीं कहना चाहिए। प्रभव और (४) शून्यवाद-बौद्ध दर्शन के माध्यमिक सम्प्रदाय में निर्वाण जरामरण के अभाव से नित्य है-अशिथिल, पराक्रम सिद्ध, विशेष के अनिर्वचनीय स्वरूप का सर्वाधिक विकास हुआ है। जैन तथा अन्य ज्ञान से प्राप्त किए जाने से और सर्वज्ञ के वचन तथा परमार्थ से निर्वाण दार्शनिकों ने शून्यता को अभावात्मक रूप में देखा है, लेकिन यह अविधमान नहीं है।४३ उस सम्प्रदाय के दृष्टिकोण को समझने में सबसे बड़ी भ्रान्ति ही कही जा सकती है। माध्यमिक दृष्टि से निर्वाण अनिवर्चनीय है, चतुष्कोटि- निर्वाण की अभावात्मकता विनिर्मुक्त है, वही परमतत्त्व है। वह न भाव है, न अभाव है।३६ यदि निर्वाण की अभावात्मकता के सम्बन्ध में उदान के रूप में निम्न वाणी से उसका विवेचन करना ही आवश्यक हो तो मात्र यह कहा बुद्ध वचन है, “लोहे पर घन की चोट पड़ने पर जो चिनगारियाँ उठती जा सकता है कि निर्वाण अप्रहाण, असम्प्राप्त, अनुच्छेद, अशाश्वत, हैं वो तुरन्त ही बुझ जाती हैं, कहाँ गई कुछ पता नहीं चलता। इसी अनिरुद्ध एवं अनुत्पन्न है।३० निर्वाण को भाव रूप इसलिए नहीं माना प्रकार काम बन्धन से मुक्त हो निर्वाण पाये हुए पुरुष की गति का जा सकता है कि भावात्मक वस्तु या तो नित्य होगी या अनित्य। कोई भी पता नहीं लगा सकता"।४४ नित्य मानने पर निर्वाण के लिए किये गये प्रयासों का कोई अर्थ नहीं शरीर छोड़ दिया, संज्ञा निरुद्ध हो गई, सारी वेदनाओं को भी होगा। अनित्य मानने पर बिना प्रयास ही मोक्ष होगा। निर्वाण को अभाव बिलकुल जला दिया। संस्कार शान्त होगए; विज्ञान अस्त हो गया।४५ भी नहीं कहा जा सकता, अन्यथा तथागत के द्वारा उसकी प्राप्ति का लेकिन दीप शिखा और अग्नि के बुझ जाने अथवा संज्ञा के उपदेश क्यों दिया जाता। निर्वाण को प्रहाण और सम्प्राप्त भी नही निरुद्ध हो जाने का अर्थ अभाव नहीं माना जा सकता, आचार्य बुद्धघोष कहा जा सकता, अन्यथा निर्वाण कृतक एवं कालिक होगा और यह विशुद्धिमग्ग में कहते हैं- निरोध का वास्तविक अर्थ तृष्णाक्षय अथवा मानना पड़ेगा कि वह काल विशेष में उत्पन्न हुआ है और यदि वह विराग है।६। प्रोफेसर कीथ एवं प्रोफेसर नलिनाक्षदत्त अग्गि वच्छगोत्तमुत्त उत्पन्न हुआ है तो वह जरा-मरण के समान अनित्य ही होगा। निर्वाण के आधार पर यह सिद्ध करते हैं कि बुझ जाने का अर्थ अभावात्मकता
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