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________________ दूसरे शब्दों में उसकी वरीयता छ मास कम कर दी जाती है / अधिकतम तपावधि ऋषभदेव के समय में एक वर्ष, अन्य बाईस 3- जो हिंसाप्रेक्षी हो अर्थात् कुल या गण के साधुओं का घात करना चाहता हो। था / यद्यपि या कि इसमें में एवं मैथुन सेवन सम्भव उसका ओं का अपराध अबको दी मास मानी गई हैं अतः अधिकतम एक साथ छ: मास का ही छेद प्रायश्चित्त दिया जा सकता है / सामान्यतया पार्श्वस्थ, अवसन्न. 5- जो प्रश्नशास्त्र का बार-बार प्रयोग करता हो / कुशील और संसक्त भिक्षुओं को छेद प्रायश्चित्त दिये जाने का स्थानांग सूत्र में ही अन्यत्र अन्योन्य मैथुनसेवी भिक्षुओं को विधान है। पाराविक प्रायश्चित्त के योग्य बताया गया है / यहाँ यह मूल प्रायश्चित्त -- मूल प्रायश्चित्त का अर्थ होता था, पूर्व की दीक्षा विचारणीय है कि जहाँ हिंसा करने वाले को, स्त्री से मैथुन करने पर्याय को समाप्तकर नवीन दीक्षा प्रदान करना / इसके परिणामस्वरूप वाले को मूल प्रायश्चित्त के योग्य बताया, वहाँ हिंसा की योजना ऐसा भिक्ष उस भिक्षसंघ में जिस दिन उसे यह प्रायश्चित्त दिया बनाने वाले एवं परस्पर मैथुन सेवन करने वालों को पाराञ्चिक जाता था वह सबसे कनिष्ठ बन जाता था / यद्यपि मूल अनवस्थाप्य प्रायश्चित्त के योग्य बताया / इसका कारण यह है कि जहाँ हिंसा और पाराञ्चिक प्रायश्चित्तों से इस अर्थ में भिन्न था कि इसमें एवं मैथुन सेवन करने वाले का अपराध व्यक्त होता है और अपराधी भिक्षु को गृहस्थवेष धारण करना अनिवार्य न था / उसका परिशोधन सम्भव होता है किन्तु इन दूसरे प्रकार के सामान्यतया पंचेन्द्रिय प्राणियों की हिंसा एवं मैथुन सम्बन्धी अपराधों व्यक्तिओं का अपराध बहत समय तक बना रह सकता है और को मूल प्रायश्चित्त के योग्य माना जाता है / इसी प्रकार जो भिक्षु संघ के समस्त परिवेश को दूषित बना देता है / वस्तुतः जब मृषावाद, अदत्तादान और परिग्रह सम्बन्धी दोषों का पुनः पुनः अपराधी के सुधार की सभी संभावनाएं समाप्त हो जाती है तो उसे सेवन करता है वह भी मूल प्रायश्चित्त का पात्र माना गया है / पाराञ्चिक प्रायश्चित्त के योग्य मानकर संघ से बहिष्कृत कर दिया जीतकल्प भाष्य के अनुसार निश्चयनय की दृष्टि से ज्ञान, दर्शन जाता है / जीतकल्प के अनुसार तीर्थंकर के प्रवचन अर्थात् श्रुत, और चारित्र की विराधना होने पर मूल प्रायश्चित्त दिया जा सकता आचार्य और गणधर की आशातना करने वाले को भी पाराञ्चिक है, परन्तु व्यवहारनय की दृष्टि से ज्ञान और दर्शन की विराधना प्रायश्चित्त का दोषी माना गया है। दूसरे शब्दों में जो जिन प्रवचन होने पर मूल प्रायश्चित्त दिया भी जा सकता है और नहीं भी दिया का अपर्णवाद करता हो वह संघ में रहने के योग्य नहीं माना जाता जा सकता है परन्तु चारित्र की विराधना होने पर तो मूल जीतकल्पभाष्य के अनुसार कषायदुष्ट, विषयदुष्ट, राजा के वध प्रायश्चित्त दिया ही जाता है / जो तप के गर्व से उन्मत्त हो अथवा की इच्छा करने वाला, राजा की अग्रमहिषी से संभोग करने वाला, जिसपर सामान्य प्रायश्चित्त या दण्ड का कोई प्रभाव ही न पड़ता भी पाराश्चिक प्रायश्चित्त का अपराधी माना गया है / वैसे परवर्ती हो, उनके लिए मूल प्रायश्चित्त का विधान किया गया है | को आचार्यों के अनुसार पाराञ्चिक अपराध का दोषी भी विशिष्ट तप साधना के पश्चात् संघ में प्रवेश का अधिकारी मान लिया गया पाराञ्चिक प्रायश्चित्त - वे अपराध जो अत्यंत गर्हित हैं और है। पाराविक प्रायश्चित्त का कम से कम समय छ: मास, मध्यम जिनके सेवन से न केवल व्यक्ति अपितु सम्पूर्ण जैन संघ की समय 12 मास और अधिकतम समय 12 वर्ष माना गया है / व्यवस्था धूमिल होती है, पाराञ्चिक प्रायश्चित्त के योग्य होते हैं। कहा जाता है कि सिद्धसेन दिवाकर को आगमों को संस्कृत भाषा पाराञ्चिक प्रायश्चित्त का अर्थ भी भिक्षु सघ से बहिष्कार ही है। में रूपान्तरित करने के प्रयल पर 12 वर्ष का पाराञ्चिक प्रायश्चित्त वैसे जैनाचार्यों ने यह माना है कि पाराञ्चिक अपराध करने वाला दिया गया था / विभिन्न पाराञ्चिक प्रायश्चित्त के अपराधों और भिक्षु यदि निर्धारित समय तक गृहस्थवेष धारण कर निर्धारित तप उनके प्रायश्चित्तों का विवरण हमें जीतकल्प भाष्य की गाथा का अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है तो उसे पुनः संघ में प्रविष्ट किया 2540 से 2596 तक मिलता है / विशिष्ट विवरण के इच्छुक जा सकता है / किन्तु मेरी दृष्टि में ऐसा करना उचित नहीं है। विद्वत्जनों को वहाँ उसे देख लेना चाहिए / बौद्ध परम्परा में भी पाराञ्चिक अपराधों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ऐसा अपराध करने वाला भिक्षु सदैव के लिए संघ से अनवस्थाव्य बहिष्कृत कर दिया जाता है अतः प्राचीन जैन आचार्यों ने अनवस्थाप्य का शाब्दिक अर्थ व्यक्ति को पद से च्युत कर पाराञ्चिक शब्द का जो अर्थ किया है उससे मैं सहमत नहीं हूँ | देना है या अलग कर देना है / इस शब्द का दूसरा अर्थ है - जो जीतकल्प के अनुसार अनवस्थाप्य और पाराञ्चिक प्रायश्चित्त संघ में स्थापना अर्थात् रखने योग्य नहीं है / वस्तुतः जो अपराधी भद्रबाहु के काल से बन्द कर दिया गया है / ' मुझे ऐसा लगता है। ऐसे अपराध करता है जिसके कारण उसे संघ से बहिष्कृत कर कि जब संघ से बहिष्कृत भिक्षु अन्य भिक्षु संघों में प्रवेश करके देना आवश्यक होता है वह जैन संघ की आन्तरिक दुर्बलताओं का प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण अनवस्थाप्य प्रायश्चित्त के योग्य माना आलोचना करते रहे होंगे तो यह समझा गया होगा कि पाराञ्चिक जाता है / यद्यपि परिहार में भी प्रायश्चित्त का प्रचलन समाप्त कर दिया जाये / स्थानाङ्ग सूत्र में भिक्षु को संघ से पृथक् किया जाता निम्न पांच अपराधों को पाराञ्चिक प्रायश्चित्त के योग्य माना गया है किन्तु वह एक सीमित समय के लिए होता है और उसका वेष 1- जो कुल में परस्पर कलह करता हो / परिवर्तन आवश्यक नहीं माना जाता / जबकि अनवस्थाप्य प्रायश्चित्त के 2 - जो गण में परस्पर कलह करता हो / योग्य भिक्षु को संघ से पृथक् किया श्रीमद् जयन्तसेनसूरि अभिनन्दन ग्रंथ / विश्लेषण (53) वृध्दों का आदर नहीं, वश में नही जबान / जयन्तसेन सर्वत्र हि, पाता वह अपमान / www.jainelibrary.org. 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SR No.211019
Book TitleJain Dharm me Prayashchitt evam Dand Vyavastha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size8 MB
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