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________________ ७०४ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ प्रस्तुत की गई हैं । उसमें महावीर के निर्वाण के बाद आगमों का विच्छेद उल्लेख है ।३४ किस प्रकार से होगा ? कौन-कौन प्रमुख आचार्य और राजा आदि होगें, सम्भवत: समग्र जैन तीर्थों का नामोल्लेख करने वाली उपलक इसके उल्लेख हैं । इस प्रकीर्णक में श्वेताम्बर परम्परा को अमान्य ऐसे रचनाओं में यह प्राचीनतम रचना है ।३२ यद्यपि इसमें दक्षिण के उन आगम आदि के उच्छेद के उल्लेख भी हैं । यह प्रकीर्णक मुख्यतः दिगम्बर जैन तीर्थों के उल्लेख नहीं है जो कि इस काल में अस्तित्ववान् महाराष्ट्री प्राकृत में उपलब्ध होता है, किन्तु इस पर शौरसेनी का प्रभाव थे। इस रचना के पश्चात् हमारे सामने तीर्थ समबन्धी विवरण देने वाली भी परिलक्षित होता है । इसका रचनाकाल निश्चित करना तो कठिन है दूसरी महत्त्वपूर्ण एवं विस्तृत रचना विविधतीर्थकल्प है, इस ग्रन्थ में फिर भी यह लगभग दसवीं शताब्दी के पूर्व का होना चाहिए, ऐसा दक्षिण के कुछ दिगम्बर तीर्थों को छोड़कर पर्व, उत्तर, पश्चिम और मध्य अनुमान किया जाता है। भारत के लगभग सभी तीर्थों का विस्तृत एवं व्यापक वर्णन उपलब्ध तीर्थं सम्बन्धी विस्तृत विवरण की दृष्टि से आगमिक और होता हैं, यह ई० सन् १३३२ की रचना है । श्वेताम्बर परम्परा की तीर्थ प्राकृत भाषा के ग्रन्थों में 'सारावली' को मुख्य माना जा सकता है। इसमें सम्बन्धी रचनाओं में इसका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान माना जा सकता मुख्यरूप से शत्रुजय अपरनाम पुण्डरीक नाम कैसे पड़ा? ये दो बातें है। इसमें जो वर्णन उपलब्ध है, उससे ऐसा लगता है कि अधिकांश मुख्य रूप से विवेचित हैं और इस सम्बन्ध में कथा भी दी गई है। यह तीर्थस्थलों का उल्लेख कवि ने स्वयं देखकर किया है । यह कृति सम्पूर्ण ग्रन्थ लगभग ११६ गाथाओं में पूर्ण हुआ है । यद्यपि यह ग्रंथ अपभ्रंश मिश्रित प्राकृत और संस्कृत में निर्मित है । इसमें जिन तीर्थों का प्राकृत भाषा में लिखा गया है, किन्तु भाषा पर अपभ्रंश के प्रभाव को उल्लेख है वे निम्न हैं - शत्रुजय, रैवतकगिरि, स्तम्भनतीर्थ, अहिच्छत्रा, देखते हुए इसे परवर्ती ही माना जायेगा। इसका काल दशवीं शताब्दी अर्बुद (आबु), अश्वावबोध (भड़ौच), वैभारगिरि (राजगिरि), कौशाम्बी, के लगभग होगा। अयोध्या, अपापा (पावा) कलिकुण्ड, हस्तिनापुर, सत्यपुर (साचौर), इस प्रकीर्णक में इस तीर्थ पर दान, तप, साधना आदि के अष्टापद (कैलाश), मिथिला, रत्नवाहपुर, प्रतिष्ठानपत्तन (पैठन), काम्पिल्य, विशेषफल की चर्चा हुई है। ग्रन्थ के अनुसार पुण्डरीक तीर्थ की महिमा अणहिलपुर, पाटन, शंखपुर, नासिक्यपुर (नासिक), हरिकंखीनगर, और कथा अतिमुक्त नामक ऋषि ने नारद को सुनायी, जिसे सुनकर उसने अवंतिदेशस्थ अभिनन्दनदेव, चम्पा, पाटलिपुत्र, श्रावस्ती, वाराणसी, दीक्षित होकर केवलज्ञान और सिद्धि को प्राप्त किया । कथानुसार कोटिशिला, कोकावसति, लिंपुरी, अंतरिक्षपार्श्वनाथ, फलवर्द्धिपार्श्वनाथ, ऋषभदेव के पौत्र पुण्डरीक के निर्वाण के कारण यह तीर्थ पुण्डरीकगिरि (फलौधी), आमरकुण्ड, (हनमकोण्ड-आंध्रप्रदेश) आदि। के नाम से प्रचलित हुआ। इस तीर्थ पर नमि, विनमि आदि दो करोड़ इन ग्रंथों के पश्चात् श्वेताम्बर परम्परा में अनेक तीर्थमालायें एवं केवली सिद्ध हुए हैं । राम, भरत आदि तथा पंचपाण्डवों एवं प्रद्युम्न, चैत्यपरिपाटियाँ लिखी गईं जो कि तीर्थ सम्बन्धी साहित्य की महत्त्वपूर्ण शाम्ब आदि कृष्ण के पुत्रों के इसी पर्वत से सिद्ध होने की कथा भी अंग हैं । इन तीर्थमालाओं और चैत्यपरिपाटियों की संख्या शताधिक है प्रचलित है। इस प्रकार यह प्रकीर्णक पश्चिम भारत के सर्वविश्रुत जैन और ये ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं-अठारवीं शताब्दी तक तीर्थ की महिमा का वर्णन करने वाला प्रथम ग्रन्थ माना जा सकता है। निर्मित होती रही हैं। इन तीर्थमालाओं तथा चैत्यपरिपाटियों में कुछ तो श्वेताम्बर परंपरा के प्राचीन आगमिक साहित्य में इसके अतिरिक्त अन्य ऐसी हैं जो किसी तीर्थ विशिष्ट से ही सम्बन्धित हैं और कुछ ऐसी हैं कोई तीर्थ सम्बन्धी स्वतन्त्र रचना हमारी जानकारी में नहीं है। जो सभी तीर्थों का उल्लेख करती हैं । ऐतिहासिक दृष्टि से इन चैत्य इसके पश्चात् तीर्थ सम्बन्धी साहित्य में प्राचीनतम जो रचना परिपाटियों का अपना महत्त्व है, क्योंकि ये अपने-अपने काल में जैन उपलब्ध होती है, वह बप्पभट्टिसूरि की परम्परा के यशोदेवसूरि के गच्छ तीर्थों की स्थिति का सम्यक् विवरण प्रस्तुत कर देती हैं । इन चैत्यके सिद्धसेनसूरि का सकलतीर्थस्तोत्र है । यह रचना ई० सन् १०६७ परिपाटियों में न केवल तीर्थक्षेत्रों का विवरण उपलब्ध होता है, अपितु अर्थात् ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की है । इस रचना में सम्मेतशिखर, वहाँ किस-किस मन्दिर में कितनी पाषाण और धातु की जिन प्रतिमाएँ शत्रुञ्जय,ऊर्जयन्त, अर्बुद, चित्तौड़, जालपुर (जालौर) रणथम्भौर, गोपालगिरि रखी गयी हैं, इसका भी विवरण उपलब्ध हो जाता है। उदाहरण के रूप (ग्वालियर) मथुरा, राजगृह, चम्पा, पावा, अयोध्या, काम्पिल्य, भद्दिलपुर, में कटुकमति लाधाशाह द्वारा विरचित सूरतचैत्यपरिपाटी में यह बताया शौरीपुर, अंगइया (अंगदिका), कन्नौज, श्रावस्ती, वाराणसी, राजपुर, गया है कि इस नगर के गोपीपुरा क्षेत्र में कुल ७५ जिनमंदिर, ५विशाल कुण्डनी, गजपुर, तलवाड़, देवराउ, खंडिल, डिण्डूवान (डिण्डवाना),नरान, जिन मंदिर तथा १३२५ जिनबिम्ब थे । सम्पूर्ण सूरत नगर में १० हर्षपुर (षट्टउदेसे) नागपुर ( नागौर-साम्भरदेश), पल्ली, सण्डेर, नाणक, विशाल जिनमन्दिर, २३५ देरासर (गृहचैत्य), ३गर्भगृह, ३९७८ जिन कोरण्ट, भिन्नमाल,(गुर्जर देश), आहड़ (मेवाड़ देश) उपकेसनगर प्रतिमाएँ थीं । इसके अतिरिक्त सिद्धचक्र, कमलचौमुख, पंचतीथीं, (किराडउए) जयपुर (मरुदेश) सत्यपुर (साचौर), गुहुयराय, पश्चिम चौबीसी आदि को मिलाने पर १००४१ जिनप्रतिमाएँ उस नगर में थीं, वल्ली, थाराप्रद, वायण, जलिहर, नगर, खेड़, मोढेर, अनहिल्लवाड़ ऐसा उल्लेख है । यह विवरण १७३९ का है। इस पर से हम अनुमान (चड्ढावल्लि), स्तम्भनपुर, कर्यवास, भरुकच्छ (सौराष्ट्र), कुंकन, कलिकुण्ड, कर सकते हैं कि इन रचनाओं का ऐतिहासिक अध्ययन की दृष्टि से मानखेड़ (दक्षिण भारत) धारा, उज्जैनी (मालवा) आदि तीर्थों का कितना महत्त्व है। सम्पूर्ण चैत्यपरिपाटियों अथवा तीर्थमालाओं का Jain Education Interational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211015
Book TitleJain Dharm me Tirth ki Avadharna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Tirth
File Size2 MB
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