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________________ ३ / धर्म और सिद्धान्त : ९९ आत्मामें प्रकट हो, (२) क्षेत्र-जिस स्थानपर प्रकट हो, (३) काल-जिस समयमें प्रकट हो, (४) भाव-शुद्ध केवलज्ञानादिरूप पर्याय । ये चारों जिस आत्माके वर्तमानपनेको प्राप्त हो जाते हैं उसके उसी क्षणमें केवलज्ञानादि प्रकट हो जाते हैं । कारण कि इनका वर्तमान हो जाना ही केवलज्ञानादिकी प्रकटता है । जिस जीवमें ये चारों जब तक भविष्यत् रूपमें रहते हैं तब तक 'योग्यता' शब्दसे कहे जाते हैं। भव्योंमें यह योग्यता पायी जाती है। इसलिये उनके केवलज्ञानादि प्रकट हो जाते हैं, अभव्योंमें इस योग्यताके नहीं रहनेसे केवलज्ञानादि प्रकट नहीं होते हैं । शंका-जिस प्रकार भव्योंमें यह योग्यता पायी जाती है उसी प्रकार अभव्योंमें क्यों नहीं पायी जाती है, इसका कारण क्या है ? उत्तर-यह निश्चित बात है कि जितने भी जीव मोक्ष जा सकते हैं उन सबमें मोक्ष जानेकी योग्यता एक ही समयमें व्यक्त नहीं होती है। यदि एक ही समयमें सब जीवोंकी योग्यताका विकास माना जाय, तो सर्वजीवोंको एक ही समयमें मोक्ष होना चाहिये, जिससे या तो अभी तक किसी जीवका मोक्ष नहीं मानना चाहिये. या फिर जिस समयमें प्रथम जीवका मोक्ष हआ होगा. उसो समयमें मोक्ष जाने वाले सर्वजी मोक्ष हो जाना चाहिये था, लेकिन ऐसी बात नहीं है, अर्थात् प्रत्येक जीवका अपने-अपने योग्यकालमें ही मोक्ष जाना संभव है, इसलिये यह बात सिद्ध होती है कि जीवोंकी मोक्ष जानेको योग्यताकी व्यक्ति अपने योग्यकाल में ही होती है। प्रत्येक द्रव्य कालिक पर्यायोंका पिड है और वे पर्यायें उतनी ही हो सकती है जितने कि कालाणुके कालिक समय है. अधिक इसलिये नहीं मान सकते. कि आगे जब कालके समयोंका सद्भाव नहीं, तो उसके भावमें दसरे द्रव्योंकी सत्ता यक्तिसे असंगत जान पड़ती है. कालाणका जब एक समय भविष्यसे वर्तमान होता है तो प्रत्येक द्रव्यकी एक भविष्यत पर्याय भी वर्तमान हो जाती है और द्वितीय क्षणमें वह समय वर्तमानसे भत हो जाता है. इसलिये प्रत्येक द्रव्यकी वह पर्याय भी भत हो जाती है। इसी तरह कालाणुके दूसरे, तीसरे आदि समय जब क्रमसे भविष्यसे वर्तमान और वर्तमानसे भूत होते जाते हैं तो प्रत्येक द्रव्यकी दूसरी, तीसरी आदि पर्यायें भी क्रमसे भविष्यसे वर्तमान और वर्तमानसे भूत होती जाती है। यह क्रम अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकाल तक चला जायगा, कभी समाप्त नहीं होगा, कारण कालाणुके समय और प्रत्येक द्रव्यकी पर्यायें अक्षयानन्त हैं। प्रत्येक जीव अनादिकालसे कर्मोंसे संबद्ध हो रहा है, लेकिन यह संबंध सर्वथा भी छूट सकता है इसलिये जीवकी दो तरह पर्यायें हो सकती है-सकर्म हालतकी और अकर्म (कर्मरहित) हालतकी। पहले प्रकारकी पर्यायोंमें जबतक भविष्यसे वर्तमान और वर्तमानसे भूत होनेका क्रम जारी रहता है, तब तक वह जीव संसारी कहलाता है और जबसे दूसरे प्रकारको पर्यायां में भविष्यसे वर्तमान और वर्तमानसे भूत होनेका क्रम प्रारम्भ होता है तबसे वह जीव मुक्त कहलाने लगता है। यह पहले बतला आये हैं कि सब जीवोंकी मोक्ष जानेकी योग्यताका विकास एक ही समयमें नहीं होता, इसलिये जैनशास्त्रोंमें छ: महीना आठ समयमें ६०८ जीव मोक्ष जाते हैं, यह नियम पाया जाता है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि कालाणुके कालिक जितने समय हों, उनमें छः महीना आठ समयमें ६०८ जीवोंके हिसाबसे जितने जीव मोक्ष जा सकते हैं, उतने जीवोंको कालिक पर्यायें दो भागोंमें विभक्त हो जाती हैं--सकर्महालतकी पर्याय और अकर्महालतकी पर्याये। जितने जीव बाकी रह जाते हैं उनकी कालिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210989
Book TitleJain Darshan me Bhavya aur Abhavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Nine Tattvas
File Size540 KB
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