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________________ ६० : सरस्वती-वरवपुत्र पं० बंशीधर व्याकरणाचार्य अभिनन्दम-ग्रन्थ होनेवाले मतिज्ञानमें उस उस इन्द्रियसे होनेवाले दर्शनको ही कारण माना गया है। यदि भिन्न समयका दर्शन भिन्न समयके ज्ञानमें कारण माना जाता है तो "अमुक प्रकारके ज्ञान में अमुक प्रकारका दर्शन ही कारण होता है। इस प्रकारका प्रतिनियत कार्यकारणभाव अल्पज्ञके दर्शनोपयोग और ज्ञानोपयोगमें नहीं बन सकता है, क्योंकि फिर तो अवधिदर्शनके बाद भी मतिज्ञान हो जाना चाहिए और चक्षुदर्शन तथा अचक्षुदर्शनके बाद भी अवधिज्ञान हो जाना चाहिए । लेकिन जब ऐसा अप्रतिनियत कार्यकारणभाव न तो संभव है और न माना ही गया है तो इसका आशय यही है कि अल्पज्ञजीवके भी दर्शनके सद्भावमें ही ज्ञान हआ करता है, दर्शनके अनन्तर उसके अभावमें नहीं। शंका-दर्शनोपयोगको आगममें सामान्यग्रहण, निराकार, निर्विकल्पक और अव्यवसायात्मक तथा ज्ञानोपयोगको विशेषग्रहण, साकार, सविकल्पक और व्यवसायात्मक स्वीकार किया गया है, अतः परस्पर विरोधपना होनेकी वजहसे दर्शन और ज्ञानका एक कालमें सद्भाव मानना अयुक्त है ? समाधान-उक्त प्रकारका विरोधीपना जब सर्वज्ञके दर्शन और ज्ञानके अन्दर भी विद्यमान है और फिर भी उसके दर्शन और ज्ञान साथ-साथ एक ही कालमें उत्पन्न होते और अवस्थित रहते हैं तो इसका आशय यही है कि दर्शन और ज्ञानका उक्त प्रकारका विरोधीपना उनके एक कालमें एकसाथ उत्पन्न होने या रहने में बाधक नहीं होता है। यदि कहा जाय कि वास्तवमें सर्वज्ञके सर्वदा सिर्फ ज्ञानोपयोग ही रहता है-उसके दर्शनका अद्भाव तो केवल उपचार मात्र है तो इस तरहसे फिर जीवमें ज्ञानशक्तिसे पृथक् दर्शननामकी एक शक्ति और उसके आवारक स्वतंत्र दर्शनावरणकर्मको स्वीकार करने की आवश्यकता ही क्या रह जाती है ? इसलिये दर्शनोपयोगके सामान्यग्रहण आदि और ज्ञानोपयोगके विशेषग्रहण आदि संकेतोंका ठीक-ठीक अर्थ न समझ सकनेके कारण हो यह भ्रम पैदा हो गया है कि दर्शन और ज्ञान परस्पर विरोधी है । अतः इस भ्रमका निराकरण करनेके लिये यहाँपर उक्त संकेतोंके अर्थपर तथा दर्शनके स्वरूपपर दृष्टि डाल लेना आवश्यक है वर्तमानमें दर्शनके निम्नलिखित अर्थ प्रचलित है१. वस्तुविशेषका बोधरहित “है" इत्याकारक मानका नाम दर्शन है। २. पहले पदार्थसे उपयोग हटनेके बाद जबतक दूसरे पदार्थसे उपयोग नहीं जुड़ जाता, इस अन्तराल में जो केवल आत्मबोध हुआ करता है उसको दर्शन समझना चाहिये। ३. उक्त प्रकारके अन्तरालमें चैतन्यकी जो अनुपयुक्त अवस्था रहती है उसका नाम दर्शन है। दर्शनके उक्त प्रचलित अर्थों से पहले और दूसरे प्रकारके अर्थ इसलिये गलत हैं कि उक्त अर्थोके स्वीकार करनेसे दर्शन भी ज्ञानकी तरह सविकल्पक, साकार और व्यवसायात्मक हो जायगा। तीसरा अर्थ इसलिये गलत है कि ऐसा कोई क्षण नहीं, जिसमें चैतन्य अनुपयुक्त अवस्थामें रहता हो। साथ ही अनुपयुक्त चैतन्यको दर्शनोपयोग माननेसे दर्शनकी उपयोगात्मकता समाप्त हो जायगी। तीसरे अनुपयुक्त चैतन्यको दर्शन और उपयुक्त चैतन्यको ज्ञान स्वीकार कर लेनेसे दर्शनावरणकर्मका पृथक् अस्तित्व स्वीकार करना असंगत हो जायगा। मेरे मतसे दर्शनका अर्थ है आत्मप्रदेशोंमें ज्ञेय पदार्थके आकारका आ जाना। इस प्रकार जिस कालमें जिस ज्ञेय पदार्थका आकार आमोद आत्मप्रदेशोंमें आता है उस कालमें उस पदार्थका ही बोध हुआ करता है, सर्वज्ञके दर्शनावरणकर्मका सर्वथा क्षय हो जानेके सबबसे समस्त आत्मप्रदेशोंमें संपूर्ण पदार्थ प्रतिक्षण स्वभावतः प्रतिबिम्बित होते रहते हैं । अतः सर्वज्ञको प्रतिक्षण संपूर्ण पदार्थोका ज्ञान होता रहता है। लेकिन अल्पज्ञके आत्मप्रदेशोंमें ज्ञेय पदार्थका प्रतिबिम्बित होना निमित्ताधीन है अर्थात प्रतिनियत पदार्थों का प्रतिनियत इन्द्रिय द्वारा प्रतिनियत आत्मप्रदेशोंमें जब-जब आकार आता है तब-तब उस-उस इंद्रिय द्वारा उन-उन पदाथोका मतिज्ञान हआ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210986
Book TitleJain Darshan me Darshanopayog ka Sthan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size544 KB
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