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________________ अनेक लौकिकऋद्धियों को प्राप्त करने में सफल रहता है। अरिहन्त प्रभाकांति वाले जिनेश्वर स्वाभाविक पवित्र एवं सुन्दर होते हैं / अरिहन्तं के चरण-कमल सदा प्रशंसनीय और स्वाभाविक सुन्दर होते हैं, इनका भगवान का देह वर्ण पियंगु जैसा हरा तो किसी का स्फटिकवत् श्वेत, ध्यान करने वाले साधक लक्ष्मी, यश, कांति एवं धैर्य को प्राप्त करते / किसी का सुवर्ण जैसा पीला, तो किसी का पद्मराग जैसा लाल एवं किसी का अंजन जैसा श्याम होता है। इन पांच वर्षों में से कोई भी आचार्य ने पूज्यपाद के चरण-कमल की संलीनता का महत्व वर्ण अरिहन्त को स्पर्श करता है। दर्शाते हुए उसका उपाय भी बताया है, और कहा है व अरिहन्त भगवान के चक्षु युगल प्रशम रस से भरे हुए हैं। तव पादौ मम हृदये वदन-कमल अति प्रसन्न हैं। श्रीमानतुंगाचार्य ने प्रभु के वदन कमल मम हृदयं तव पदद्वये लीनम् / का स्वरूप दर्शाते हुए बहुत सुंदर कहा है कि सदैव उदय रहने वाला, तिष्ठतु जिनेन्द्र, मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाला, राहु के मुख द्वारा ग्रसे जाने तावद्यावनिर्वाणसंप्राप्ति: / / के अयोग्य मेघों के द्वारा छिपाने के अयोग्य, अधिक कांतिवाला और अर्थात् हे अरिहन्त / जब तक मैं निर्वाण प्राप्त करूं, तब तक संसार को प्रकाशित करने वाला आपका मुख कमल रूपी अपूर्व आपके चरण युगल मेरे हृदय में और मेरा हृदय आपके दोनों चरणों चन्द्रमण्डल सुशोभित होता है। देव, मनुष्य तथा धरणेन्द्र के नेत्रों का में लीन बना रहे। हरण करने वाला एवं संपूर्ण रूप से जीत लिया है तीनों जगत की हृदय - कमल में तात्विक प्रतिष्ठा: उपमाओं को जिसने ऐसा आप का मुख कहां और कहां कलंक से सम्यक् प्रकार से परमात्मा में अपने विशुद्ध चित्त को स्थापित मलिन चन्द्रमा का मुख मंडल। करना और बाद में अर्हत् स्वरूप का ध्यान करना। तीन गढ़ में प्रभु का वदन - कमल परम मंगल स्वरूप है। प्रात:काल स्फुरायमान प्रकाश वाले समवसरण के मध्य में रहे हुए चौंसठ इन्द्रों स्मरणीय है, ध्यान द्वारा दर्शनीय है। कल्याण करने वाला है। इस से जिनके चरण कमल पूजित हैं, ऐसे तीन छत्र, पुष्पवृष्टि सिंहासन, प्रकार वदन - कमल के ध्यान के कई लौकिक, लोकोत्तर परिणाम हैं। चामर अशोक वृक्ष, दुंदुभि दिव्य ध्वनि और भा-मण्डल ऐसे आठ महाप्रातिहार्यों से अलंकृत सिंह के लांछन से युक्त सुवर्णवत् कांतिवाले प्रभु का इस प्रकार ध्यान करने से अज्ञान दूर होता है और ज्ञान पार्षदों में विराजमान श्रीवर्धमान जिनेश्वर को ध्याता अपने हृदय में का प्रादुर्भाव होता है, तथा भव्यजन सावधान बुद्धि से युक्त होकर प्रभु साक्षात् देखें / ऐसे साधक नेत्र एवं मन को उनमें लीन कर दें। के निर्मल मुख कमल आदि पर लक्ष्य बांधने वाला देदीप्यमान स्वर्ग की सम्पत्तियों को भोग कर कर्म रूपी मल समूह से रहित होकर शीघ्र प्रतिष्ठा के बाद साधक को अपनी साधना का पूर्ण विश्वास होना ही मुक्ति पा जाता है। चाहिए, क्योंकि शंका, संशय या संदेह करने से साधना सफल नहीं होती है। साधना की सफलता का परम रहस्य यही है कि जिसने हर्ष के प्रकर्ष से युक्त परमात्मा को जो विधि पूर्वक ध्याता है, अपने हृदय कमल में ऐसे जिनेश्वर भगवन्त की प्रतिष्ठा करली है, वह मोक्ष का सुख प्राप्त करता है। उसके लिए विश्व में ऐसा कोई कल्याण नहीं है, जो उसके सामने न मधुकर मौक्तिक आता हो / वह उसकी प्राप्ति में अवश्य ही सफल रहता है। उसके अशुभ से विपरीत है-शुभ / यह मनुष्य को मनुष्यता के दुःख प्रथम समाप्त हो जाते हैं। उसकी देह सुवर्णवत् आभा संपन्न हो शंगार रुप भावों से ओतप्रोत कर देता है.। जब मनुष्य शुभ की जाती है। एक बार अरिहंत परमात्मा को हृदय में धारण करने पर ओर प्रगति करता है, तब वह शुद्ध को पहचान सकता है। अन्यत्र कहीं उसका मन नहीं रमता। इस मन रूपी मंदिर में जिनेश्वर शुद्धिकरण और निशुद्धिकरण की प्रक्रिया के शुभारंभ के पश्चात् के स्फुरायमान होने से पापरूपी अन्धकार का विनाश हो जाता है। ज्ञातव्य के ज्ञान के पश्चात् शुभ से शुद्ध प्राप्त किया जा सकता जिस प्रकार अन्य स्थानों को छोड़कर कमल जैसे सरोवर में विकसित है। इसे समझने के लिए गहन विचार मंथन की आवश्यकता होता है, उसी प्रकार एक बार अरिहन्त परमात्मा में संलीन हृदय कभी है, पर पहले इसे भावों की तरतमता से जान लेना आवश्यक है। भी नहीं रुकता। हृदय कमल में तात्विक प्रतिष्ठा, यह ध्यान की एक जिनशासन में अशुभ से शुभ में प्रवेश पाने के लिए प्रार्थना का विधान किया गया है। प्रकृष्ट उत्कृष्ट भाव निर्मल होते है, उत्तम पद्धति है। उनकी नस नस में निर्माण समाया हुआ होता है। इसीलिए भावों वदन-कमल का ध्यान: की जाज्वल्यमान पुरस्कृति के लिए अचेत मन को जागृत करना परमात्मा के शांत - प्रशांत वदन, उनमें साधना की सिद्धि से बहुत आवश्यक है। युक्त दैदीप्यमान दिव्य दो नेत्र युगल। न केवल वदन कमल ही, आकर्षण की मदिरा से पथभ्रष्ट होकर जो भव के प्रेमपाश अरिहन्त परमात्मा का संपूर्ण देह ही अद्भुत एवं रूप सम्पन्न होता है। में जकड़े गये हैं, उनके लिए बार-बार यह कहा गया है कि जब जन्मकृत चार अतिशयों में अद्भुत रूप और गंध से युक्त देह का होना तक अन्तर्मन में सद्भावों की सरिता कल कल करती बहने नहीं प्रथम अतिशय है / पियंगु, स्फटिक, सुवर्ण, पद्मराग और अंजन जैसी लगेगी, तब तक पवित्रता की अभिव्यक्ति बिल्कुल असंभव है। श्रीमद् जयंतसेनसरि अभिनंदन ग्रंथावाचना बनी बिगड़ती जिंदगी, करे अहं नर कोय / जयन्तसेन विनम्रता, सुखदायक नित होय // www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.210981
Book TitleJain Darshan-Me Dhyan Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktiprabhashreeji
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Meditation Yoga
File Size2 MB
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