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________________ में भटटारक गादियाँ स्थापित होने लगीं । राजस्थान गांव-गाँव में मन्दिरों का निर्माण हआ जिसमें संस्कृति में चित्तौड़, चम्पावती, तक्षकगढ़, आमेर, सांगानेर, ही पुनर्जीवित नहीं हई अपित मूर्तिकला, स्थापत्यकला जयपूर, श्री महावीर जी, अजमेर, नागौर, जौवनेर, आदि कलाओं को भी प्रोत्साहन प्राप्त हआ। 1664 मध्यप्रदेश में ग्वालियर एव सोनागिरि जी, बागड़प्रदेश में में मोजमाबाद (राजस्थान) में तीन शिखरोंवाले डंगरपुर, सागवाड़ा, बासवाड़ा एवं रिषभदेव, गुजरात में मन्दिर के जीर्णोद्वार के पश्चात् जो विशाल प्रतिष्ठा हुई नवसारी, सूरत, खम्भात, धोधा, गिरनगर, महाराष्ट्र में थी उसे तो बादशाह अकबर एवं आमेर के महाराज कारंजा एवं नागपुर, दक्षिण में मूडविद्री, हुम्मच एवं श्रवण मानसिंह का भी आशीर्वाद प्राप्त था । करोड़ों रुपया बेलगोला आदि स्थानों में भट्टारकों की गादियाँ पानी की तरह बहाया गया : इसी तरह 1826 में सवाई स्थापित हो गयीं। इन भट्टारकों ने अपने-अपने गण माधोपुर के भट्टारक सुरेन्द्र कीति के तत्वाधान व प्रेरणा संघ व गच्छ स्थापित कर लिए। अपने प्रभाव से क्षेत्र से जो अभूतपूर्व प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित हआ संभवतः बाँट लिए और अपनी-अपनी सीमाओं में धर्म के एक- वह अपने ढंग का पहला महोत्सव था। राजस्थान में मात्र स्तम्भ बन गये । 16वीं शताब्दी में देहली गादी के आज कोई ऐसा मन्दिर नहीं है जिसमें 1826 में भट्टारकों ने अपने ही अधीन मंडलाचार्य पद बनाये जो प्रतिष्ठापित मूर्ति न हो। जयपुर, सागवाड़ा, चांदखेड़ी, भट्टारकों की ओर से प्रतिष्ठा, पूजा एवं समारोह झालरापाटन में जो विशाल एवं कलापर्ण मत्तियों हैं आदि का नेतृत्व करने लगे। उन सबकी प्रतिष्ठा में इन भट्टारकों का प्रमुख हाथ था। इन भटारकों ने जैन साहित्य और संस्कृति के विकास में अपना महत्वपूर्ण योग दिया । 1350 से . जब इन भट्टारकों की कीति अपनी चरम सीमा - 1850 तक भट्टारक ही आचार्य, उपाध्याय एवं मुनि पर पहुंचने लगी तो इनकी निशेधिकाएं व कीर्तिस्तम्भ रूप में जनता द्वारा पूजे जाते रहे तथा जैन संस्कृति बनने लगे । आवां (राजस्थान) में पहाड़ पर भट्टारक - के प्रधान स्तम्भ रहे। इन 500 वर्षों में जितने भी प्रभाचन्द्र, जिनचन्द्र और शुभचन्द्र की इसी तरह की प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित हए उनमें इनकी प्रेरणा तीन निषेधिकाएं हैं जो भट्टारकों में तत्कालीन जनता एवं आशीर्वाद ने जबरदस्त कार्य किया। संवत् 1548, की श्रद्धा एवं भावना को व्यक्त करनेवाली हैं । इसी 1664 1783, एवं 1826 में देश में विशाल प्रतिष्ठा तरह चित्तौड़ किले में प्रतिष्ठापित कीर्तिस्तम्भ चाकस में समारोह आयोजित हए, इन सब में भट्टारकों का बोल बनवाया गया जिसमें भटटारकों की मत्तियों के अतिबाला रहा। हजारों मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित होकर देश के रिक्त उनके होने का भी समय दिया हआ है। इसी विभिन्न मन्दिरों में विराजमान की गई । उत्तर भारत के तरह का कीर्तिस्तम्भ आमेर के बाहर की बस्ती में अधिकांश जैन मन्दिरों में आज इन संवतों में प्रतिष्ठापित स्थापित किया हआ है। ये सब कीर्तिस्तम्भ भटटारकों मत्तियाँ प्राप्त होती हैं । आज सारा बागड़प्रदेश 'मालवा' के उत्कर्ष के तो प्रमाण हैं ही किन्तु उनके द्वारा सम्पाकोटाबंदी एवं झालावाड़ का प्रदेश, चम्पावती, टोड़ा- दित सांस्कृतिक सेवाओं को भी घोषित करनेवाले हैं। राम सिंह एवं रणथम्भौर का क्षेत्र जितना जैन पूरातत्व से समद्ध है उतना देश का अन्य क्षेत्र नहीं । संवत जयपुर के काला छावड़ा के मन्दिर में पार्श्वनाथ 1548 में भटटारक जिनचन्द्र ने मुडासा नगर में की एक धातु की मूत्ति है जिसकी प्रतिष्ठा संवत 1413 जारों मत्तियों की प्रतिष्ठा करवा कर सारे देश में जैन में वैशाख सुदी 6 के दिन हुई थी। इसमें भटटारक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में विशेष योग दिया। देश के प्रभाचन्द्र का उल्लेख हुआ है। इसी तरह आवां तथा २३२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210929
Book TitleJain Sahitya evam Sanskruti ke Vikas me Bhattarako ka Yogadan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherZ_Tirthankar_Mahavir_Smruti_Granth_012001.pdf
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size596 KB
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