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________________ 456 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ हुआ पत्थर अप्रयास ही स्वाभविक रूप से गोल हो जाता है उसी प्रकार के तीव्रतम आकांक्षा। क्योंकि जिसमें सत्याभीप्सा होगी वही सत्य को पा संसार में भटकते हुए प्राणी को अनायास ही जब कर्मावरण के अल्प सकेगा, सत्याभीप्सा से ही अज्ञान से ज्ञान की ओर प्रगति होती है। यही होने पर यथार्थता का बोध हो जाता है तो ऐसा सत्यबोध निसर्गज कारण है कि उत्तराध्ययनसूत्र में संवेग का प्रतिफल बताते हुए महावीर (प्राकृतिक) होता हैं। बिना किसी गुरु आदि के उपदेश के स्वाभाविक कहते हैं कि संवेग से मिथ्यात्व की विशुद्धि होकर यथार्थ-दर्शन की रूप में स्वत: उत्पन्न होने वाला ऐसा सत्य बोध निसर्गज सम्यक्त्व उपलब्धि (आराधना) होती है।५८ कहलाता है। 3. निर्वेद- इस शब्द का अर्थ होता है उदासीनता, वैराग्य, 2. अधिगमज सम्यक्त्व-गुरु आदि के उपदेशरूप निमित्त अनासक्ति। सांसारिक प्रवृत्तियों के प्रति उदासीन भाव रखना, क्योंकि से होने वाला सत्यबोध या सम्यक्त्व अधिगमज सम्यक्त्व कहलाता है। इसके अभाव में साधना-मार्ग पर चलना सम्भव नहीं होता। वस्तुतः इस प्रकार जैन दार्शनिक न तो वेदान्त और मीमांसा दर्शन के निर्वेद निष्काम भावना या अनासक्त दृष्टि के उदय का आवश्यक अंग है। अनुसार सत्य के नित्य प्रकटन को स्वीकार करते हैं और न न्याय-वैशेषिक 4. अनुकम्पा- इस शब्द का शब्दिक निर्वचन इस प्रकार हैऔर योगदर्शन के समान यह मानते हैं कि सत्य का प्रकटन ईश्वर के द्वारा अनु+कम्पा। अनु का अर्थ है तदनुसार, कम्प का अर्थ है धूजना या होता है वरन् वे तो यह मानते हैं कि जीवात्मा में सत्यबोध को प्राप्त करने कम्पित होना अर्थात् किसी अन्य के अनुसार कम्पित होना। दूसरे शब्दों की स्वाभाविक शक्ति है और वह बिना किसी दूसरे की सहायता के सत्य का में कहें तो अन्य व्यक्ति के दुःखित या पीड़ित होने पर तदनुकूल अनुभूति बोध प्राप्त कर सकता है यद्यपि किन्ही विशिष्ट आत्माओं (तीर्थंकर) द्वारा हमारे अन्दर उत्पन्न होना ही अनुकम्पा है। दूसरे के सुख-दुःख को अपना सत्य का प्रकटन एवं उपदेश भी किया जाता है।५७ सुख-दुःख समझना यही अनुकम्पा का अर्थ है। परोपकार के नैतिक सिद्धान्त का आधार यही अनुकम्पा है। इसे सहानुभूति भी कहा जा सम्यक्त्व के पाँच अंग सकता है। सम्यक्त्व यथार्थता है, सत्य है; इस सत्य की साधना के लिए 5. आस्तिक्य- आस्तिक्य शब्द आस्तिकता का द्योतक है। जैन विचारकों ने पाँच अंगों का विधान किया है। जब तक साधक इन्हें जिसके मूल में अस्ति शब्द है, जो सत्ता का वाचक है। आस्तिक किसे नहीं अपना लेता है वह यथार्थता या सत्य की आराधना एवं उपलब्धि कहा जाए इस प्रश्न का उत्तर अनेक रूपों में दिया गया है। कुछ ने कहामें समर्थ नहीं हो पाता। सम्यक्त्व के निम्न पाँच अंग हैं : जो ईश्वर के अस्तित्व या सत्ता में विश्वास करता है, वह आस्तिक है। 1. सम- सम्यक्त्व का पहला लक्षण है सम। प्राकृत भाषा का दूसरों ने कहा- जो वेदों में आस्था रखता है, वह आस्तिक है। लेकिन यह 'सम' शब्द संस्कृत भाषा में तीन रूप लेता है- 1. सम, 2. शम, जैन विचारणा में आस्तिक और नास्तिक के विभेद का आधार इससे 3. श्रम। इन तीनों शब्दों के अनेक अर्थ होते हैं। पहले 'सम' शब्द के भिन्न है। जैन दर्शन के अनुसार जो पुण्य-पाप, पुनर्जन्म, कर्म-सिद्धान्त ही दो अर्थ होते हैं। पहले अर्थ में यह सहानुभूति या तुल्यता है अर्थात् और आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह आस्तिक है। सभी प्राणियों को अपने समान समझना है। इस अर्थ में 'आत्मवत् जैन विचारकों की दृष्टि में यथार्थता या सम्यक्त्व के निम्न सर्वभूतेषु' के महान् सिद्धान्त की स्थापना करता है जो अहिंसा की पाँच दूषण (अतिचार) माने गये हैं जो सत्य या यथार्थता को अपने विचार-प्रणाली का आधार है। दूसरे अर्थ में इसे सम-मनोवृत्ति या विशुद्ध स्वरूप में जानने अथवा अनुभूत करने में बाधक होते हैं। समभाव कहा जा सकता है अर्थात् सुख-दुःख, हानि-लाभ एवं अनुकूल अतिचार वह दोष है जिससे व्रत भंग तो नहीं होता लेकिन उसकी और प्रतिकूल दोनों स्थितियों में समभाव रखना, चित्त को विचलित नहीं सम्यक्त्व प्रभावित होता है। सम्यक् दृष्टिकोण की यथार्थता को प्रभावित होने देना। यह चित्तवृत्ति संतुलन हैं संस्कृत के 'शम रूप के आधार पर करने वाले 3 दोष है- 1. चल, 2. मल, और 3. अगाढ़। चल दोष इसका अर्थ होता है शांत करना अर्थात् कषायाग्नि या वासनाओं को से तात्पर्य यह है कि यद्यपि व्यक्ति अन्तःकरणपूर्वक तो यथार्थ दृष्टिकोण शांत करना। संस्कृत के तीसरे रूप 'श्रम' के आधार पर इसका निर्वचन के प्रति दृढ़ रहता है लेकिन कभी-कभी क्षणिक रूप में बाह्य आवेगों से होता है- प्रयास, प्रयत्न या पुरुषार्थ करना। प्रभावित हो जाता है। मल वे दोष हैं जो यथार्थ दृष्टिकोण की निर्मलता 2. संवेग- संवेग शब्द का शाब्दिक विश्लेषण करने पर को प्रभावित करते हैं। मल निम्न पाँच हैंउसका निम्न अर्थ ध्वनित होता है-सम+वेग, सम्यक्त् उचित, वेग- गति 1. शंका-वीतराग या अर्हत् के कथनों पर शंका करना, अर्थात् सम्यक्गति। सम् शब्द आत्मा के अर्थ में भी आ सकता है। इस उनकी यथार्थता के प्रति संदेहात्मक दृष्टिकोण रखना। प्रकार इसका अर्थ होगा आत्मा की ओर गति। दूसरे, सामान्य अर्थ में 2. आकांक्षा- स्वधर्म को छोड़कर पर-धर्म की इच्छा करना, संवेग शब्द अनुभति के अर्थ में भी प्रयुक्त होता हैं यहाँ इसका तात्पर्य आकांक्षा करना अथवा नैतिक एवं धार्मिक आचरण के फल की आकांक्षा होगा स्वानुभूति, आत्मानुभूति अथवा आत्मा के आनन्दमय स्वरूप की करना। फलासक्ति भी साधना-मार्ग में बाधक तत्त्व मानी गयी है। अनुभूति। तीसरे, आकांक्षा की तीव्रतम अवस्था को भी संवेग कहा जाता 3. विचिकित्सा- नैतिक अथवा धार्मिक आचरण के फल के है। इस प्रसंग में इसका अर्थ होगा सत्याभीप्सा अर्थात् सत्य को जानने प्रति संशय करना कि मेरे इस सदाचरण का प्रतिफल मिलेगा या नहीं। प्रभावित हा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.210914
Book TitleJain Sadhna ka Adhar Samyagdarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Samyag Darshan
File Size2 MB
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