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________________ जैन श्रमण संघ : समीक्षात्मक परिशीलन उपर्युक्त उद्धरणों में जो दीक्षा-काल दिया गया है, वह न्यूनतम है । उससे कम समय का दीक्षित श्रमण साधारणतः ऊपर वर्णित पदों का अधिकारी नहीं होता । पद और दीक्षा- काल आठ वर्ष, पांच वर्ष और तीन वर्ष के दीक्षा - काल के रूप में ऊपर तीन प्रकार के विकल्प उपस्थित किये गये हैं । अन्य योग्यताएँ सबकी एक जैसी बतलाई गई हैं । आठ वर्ष के दीक्षित श्रमण को आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक, स्थविर, गणी तथा गणावच्छेदक का पद दिया जाना कल्पनीय - विहित कहा गया है। सात पदों में से छः पदों का उल्लेख यहाँ हुआ है । गणधर का पद उल्लिखित नहीं है । पर, भावतः उसे यहाँ अन्तर्गभित मान लिया जाना चाहिए । तात्पर्य यह है कि जिस श्रमण का दीक्षा पर्याय आठ वर्ष का हो चुका है और जिसमें यदि दूसरी अपेक्षित योग्यताएँ हों तो वह सभी पदों का अधिकारी है । पाँच वर्ष के दीक्षित श्रमण को, यदि अन्य योग्यताएँ उसमें हों तो आचार्य और उपाध्याय पद का अधिकारी बताया है । तीन वर्ष के दीक्षित श्रमण को और योग्यताएँ होने पर उपाध्याय पद के लिए अनुमोदित किया है । १४५ इन तीन विकल्पों में से दो में आचार्य का उल्लेख हुआ है और उपाध्याय का तीनों में ही । इसका आशय यह है कि आचार्य के लिए कम से कम पाँच वर्ष का दीक्षा- काल होना आवश्यक है । तब यदि उनका आठ वर्ष का दीक्षा-काल हो तो और भी अच्छा। आठ वर्ष के दीक्षा काल की अनिवार्यता वस्तुतः प्रवर्तक, स्थविर, गणी तथा गणावच्छेदक के पद के लिए है । पहले विकल्प में क्रमश: सभी पदों का उल्लेख करना था अतः आचार्य का भी समावेश कर दिया गया । उपाध्याय पद के लिए कम से कम तीन वर्ष का दीक्षा - काल अनिवार्य या आठ वर्ष का हो तो और उत्तम है । जैसा कि कहा गया है, आठ वर्ष के आचार्य तथा उपाध्याय के अतिरिक्त अन्य पदों के लिए तथा पांच वर्ष के दीक्षा - काल की अनिवार्यता केवल आचार्य पद के लिए है । पहले विकल्प में सभी पदों का और दूसरे विकल्प में दो पदों का उल्लेख करना था अतः दोनों स्थानों पर उपाध्याय का समावेश किया गया । श्रुत-योग्यता, आचार-प्रवणता, ओजस्वी व्यक्तित्व तथा जीवन के अनुभव - ये चार महत्वपूर्ण तथ्य हैं, जिनका संघीय पदों से अन्तरंग सम्बन्ध है । Jain Education International उपाध्याय का पद श्रुत-प्रधान या सूत्र - प्रधान है। आत्म-साधना तो जीवन का अविच्छिन्न अंग है ही, उसके अतिरिक्त उपाध्याय का प्रमुख कार्य श्रमणों को सूत्र वाचना देना है । यदि कोई श्रमण इस ( श्रुतात्मक) विषय में निष्णात हों तो अपने उत्तरदायित्व का भली-भाँति निर्वाह करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं आती । व्यावहारिक जीवन के अनुभव आदि की वहाँ विशेष अपेक्षा नहीं रहती । वहाँ श्रीआनन्द अन्थ । फिर वह यदि पांच दीक्षा - काल की अनिवार्यता आचार्य प्रव For Private & Personal Use Only Vo श अभिनंदन www.jainelibrary.org
SR No.210884
Book TitleJain Shramansangh Samikshatmak Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChhaganlal Shastri
PublisherZ_Anandrushi_Abhinandan_Granth_012013.pdf
Publication Year1975
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size3 MB
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