SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 25
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जैन श्रमण संघ : समीक्षात्मक परिशीलन १३६ प्रवर्तक गण या श्रमण-संघ की चिन्ता करते हैं अर्थात् वे उसकी गतिविधि का ध्यान रखते हैं । वे जिन श्रमणों को तप, संयम तथा प्रशस्त योगमूलक अन्यान्य सत्प्रवृत्तियों में योग्य पाते हैं, उन्हें उनमें प्रवृत्त या उत्प्रेरित करते हैं। मूलतः तो सभी श्रमण श्रामण्य का निर्वाह करते ही हैं पर रुचि की भिन्नता के कारण किन्हीं का तप की ओर अधिक झकाव होता है. कई शास्त्रानुशीलन में अधिक रस लेते हैं, कई संयम के दूसरे पहलुओं की ओर अधिक आकृष्ट रहते हैं । रुचि के कारण किसी विशेष प्रवृत्ति की ओर श्रमण का उत्साह हो सकता है पर हर किसी को अपनी यथार्थ स्थिति का भली भाँति ज्ञान हो, यह आवश्यक नहीं । अति उत्साह के कारण कभी-कभी अपनी क्षमता को आंक पाना भी कठिन होता है । ऐसी परिस्थिति में प्रवर्तक का यह कर्तव्य है कि जिनको जिस प्रवृत्ति के लिए योग्य मानते हों, उन्हें उस ओर प्रेरित और प्रवृत्त करें । जो उन्हें जिस प्रवृत्ति के सम्यक् निर्वाह में योग्य न जान पड़ें, उन्हें वे उस ओर से निवृत्त करें । साधक के लिए इस प्रकार के पथ-निर्देशक का होना परम आवश्यक है । इससे उसकी शक्ति और पुरुषार्थ का समीचीन उपयोग होता है । ऐसा न होने से कई प्रकार की कठिनाइयाँ उपस्थित हो जाती हैं । उदाहरणार्थ- कोई श्रमण अति उत्साह के कारण अपने को उग्र तपस्या में लगाये पर कल्पना कीजिये, उसकी दैहिक क्षमता इस प्रकार की न हो, स्वास्थ्य अनुकूल न हो, मानसिक स्थिरता कम हो तो वह अपने प्रयत्न में जैसा सोचता है, चाहता है, सफल नहीं हो पाता । उसका उत्साह टूट जाता है, वह अपने को शायद हीन भी मानने लगता है । अतएव प्रवर्तक, जिनमें ज्ञान, अनुभव तथा अनूठी सूझबूझ होती है, का दायित्व होता है कि वे श्रमणों को उनकी योग्यता के अनुरूप उत्कर्ष के विभिन्न मार्गों पर गतिशील होने में प्रवृत्त करें, जो उचित न प्रतीत हों, उनसे निवृत्त करें । उक्त तथ्य को स्पष्ट करते हुए और भी कहा गया है तवसंजमनियमेसु, जो जुग्गो तत्थ तं पवेत्तई । असहू य नियतंत्ती, गणतत्तल्लो पवतीओ ॥ तपः संयमयोगेषु मध्ये यो यत्र योग्यस्तं तत्र प्रवर्त्तयन्ति, असहांश्च । असमर्थाश्च निवर्त्तयन्ति । एवं गणतृप्तिप्रवृत्ताः प्रवर्तिनः । १ सयम, तप आदि के आचरण में जो धैर्य और सहिष्णुता चाहिए, जिनमें वह होती है, वे ही उसका सम्यक् अनुष्ठान कर सकते हैं। जिनमें वैसी सहनशीलता और दृढ़ता नहीं होती, उनका उस पर टिके रहना सम्भव नहीं होता । प्रवर्तक का यह काम है कि किस श्रमण को किस ओर प्रवृत्त करे, कहाँ से निवृत्त करे । गण को तृप्त - तुष्ट-उल्लसित करने में प्रवर्तक सदा प्रयत्नशील रहते हैं । स्थविर जैन संघ में स्थविर का पद अत्यन्त महत्वपूर्ण है । स्थानांग सूत्र' में दश प्रकार के स्थविर बतलाये गये हैं, जिनमें से अन्तिम तीन जाति-स्थविर, श्रुत-स्थविर तथा पर्याय स्थविर का सम्बन्ध विशेषतः श्रमण १. व्यवहार भाष्य, उद्देशक १, गाथा ३४० २. स्थानांगसूत्र, स्थान १०, सूत्र ७६२ Jain Education International INAKAAAAcc UNC शॉ For Private & Personal Use Only JAJAAJJAJARAM श्रीआनन्द आशद श्रानन्दक अभिनंदन अभिनंद www.jainelibrary.org
SR No.210884
Book TitleJain Shramansangh Samikshatmak Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChhaganlal Shastri
PublisherZ_Anandrushi_Abhinandan_Granth_012013.pdf
Publication Year1975
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy