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________________ इसमें सब प्राणि-मात्र को अपनी आत्मा का यथार्थ स्वरूप बतलाकर अपनी आत्मा में स्थिर होने का, संसार-पारतंत्र्य से मुक्त होकर-स्वाधीन-स्वतंत्र-शाश्वत सुखमय जीवन बिताने का मार्ग-दर्शन किया है। इसलिए यह जैन शासन किसी एक पंथ का या किसी धर्म-विशेष का, किसी जाति-विशेष का न होकर समस्त प्राणि-मात्र के हित का, कल्याण का मार्ग बतलाने वाला सार्वधर्म-शासन, आत्मधर्म शासन कहलाता है। पक्षपातो न मे वीरे न द्वषः कपिलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः॥ (आ० हरिभद्र कृत लोकतत्त्वनिर्णय, १/३८) जैन शासन के प्रणेता भगवान् महावीर हैं, ऐसा जैन शासन का पक्षपात नहीं है। अन्य मत के प्रणेता कपिल, सौगत आदि हैं, उनके प्रति द्वेषभाव भी नहीं है । नाम से कोई भी व्यक्ति हो, परन्तु जो सर्वज्ञ और वीतराग है, जिसका वचन युक्ति-आगम द्वारा बाधित नहीं है, प्रत्यक्ष प्रतीति द्वारा बाधित नहीं है, उसी का वचन कल्याणकारी मान कर स्वीकार करना चाहिए। ___ अन्य दर्शन के नेताओं ने अपने भक्तों को हमेशा अपने भक्त बने रहने का ही उपदेश दिया है-मेरी भक्ति करने वालों को मैं सुखी बना सकता हूं। तथा मेरी भक्ति न करने वालों को मैं यथोचित दण्ड दे सकता हूं-इस प्रकार अपने भक्तों को सदैव पराधीन रहने का ही उपदेश दिया है। परन्तु जैन शासन सब प्राणि-मात्र को पराधीन-ईश्वराधीन न रहकर स्वाधीन—स्वतंत्र होने का उपदेश देता है। यही जैन शासन का एक अद्वितीय वैशिष्ट्य है । जैन शासन और अन्य शासन में यही एक विशेषता है। प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है। पराधीन-परतंत्र नहीं है। प्रत्येक जीव को अपना स्वतंत्र अस्तित्व जीवन जीने का अधिकार है। प्रत्येक द्रव्य अपना परिणमन अपनी सामर्थ्य से करने में स्वतंत्र है। प्रत्येक द्रव्य अपनी पर्याय-सृष्टि की रचना करने में तथा संहार करने में सर्वथा स्वतन्त्र है, प्रभु है, समर्थ है, ईश्वर है । परतंत्र, पराधीन, अन्य ईश्वराधीन नहीं है । इस प्रकार स्वाधीनता-स्वतन्त्रता-का वस्तुसिद्धान्त जैन शासन बतलाता है। दूसरे द्रव्य का स्वतंत्र अस्तित्व अपहरण कर अन्य वस्तु पर, चेतन-अचेतन वस्तु पर, अपना प्रभुत्व-स्वामित्व बलात् स्थापित करना, इसी का नाम हिंसा' है। लोक-व्यवहार में प्राणियों के घात को हिंसा कहते हैं । परन्तु जैन शासन में रागद्वेष-मोहभाव को अपने ज्ञाता, द्रष्टा स्वभाव का घातक होने से हिंसा कहा गया है। अन्य वस्तु पर अपना स्वामित्व-प्रभुत्व स्थापन करना, अन्य वस्तु का स्वतन्त्र अस्तित्व अपहरण करना, इसी को हिंसा कहा है । अहिंसा जैन शासन का प्राण है। अहिंसा का सर्वांग परिपालन होने के लिए सब अन्य वस्तुओं पर का ममत्व-भाव-स्वामित्व-बुद्धि-छोड़कर, सब बाह्य-आभ्यंतर परिग्रह का त्याग कर, नग्न दिगम्बर-अवस्था धारण करना जैन शासन का मुख्य सिद्धान्त माना गया है। अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमं न सा तत्रारम्भोऽस्त्यणुरपि च यत्राश्रमविधौ ॥ ततस्तसिद्ध यर्थं परमकरुणो ग्रन्थमुभयम् भवानेवात्याक्षीत् न च विकृतवेषोपधिरतः ॥ (बृ० स्वयम्भूस्तोत्र, २१/४) अहिंसा-यह जगत् के सब प्राणियों का जगत्प्रसिद्ध परम ब्रह्म है। जहां अणुमात्र भी आरम्भ-परिग्रह है, अन्य वस्तु पर ममत्व-स्वामित्व-बुद्धि है, वहां पर अहिंसा का यथार्थ परिपालन नहीं बन सकता। इसलिए अहिंसा धर्म का सर्वांगपूर्ण पालन होने के लिए जैन शासन के नेताओं ने सब बाह्य-आभ्यंतर परिग्रह का त्याग कर नग्न दिगंबर अवस्था धारण कर सम्यक् चारित्र कोजैन शासन का साक्षात् स्वरूप बतलाया है। जैन शासन में जैन शासन के नेता सर्वज्ञ भगवान् 'जिन' देव की मूर्ति आत्मध्यानस्थ, नग्न दिगंबर, वीतराग, परमशांत मुद्रा धारण करने वाली मानी गई है, तथा जैन शासन के उपदेशक गुरु-साधु-मुनि भी महाव्रतधारी, संयमी, नग्न दिगंबर ही पूज्य माने गये हैं। अहिंसा, अपरिग्रहवाद और अनेकान्तवाद-ये जैन शासन के प्रमुख सिद्धान्त माने गये हैं। आत्मा स्वभाव से ज्ञाता-द्रष्टा है। अपने स्वभाव में अपना उपयोग स्थिर करना, इसीका नाम अहिंसा है। अपने स्वभाव को छोड़कर शरीर आदि अन्य परद्रव्य, और राग-द्वेष-मोह रूप परभाव, इनकी तरफ उपयोग लगाना, इसीका नाम हिंसा है। परद्रव्य में एकत्व बुद्धि, ममत्व-बुद्धि-इसी को मिथ्यात्व कहते हैं। मिथ्यात्व ही महापाप है, आत्मा के स्वभाव का घातक है। परपदार्थ में ज्ञाता-द्रष्टाभाव न रखकर इष्ट-अनिष्ट बुद्धि रखना, पंचेंद्रियों के विषय में प्रवृत्ति करना, काम-क्रोध-मान-माया-लोभ इनमें प्रवृत्ति करना, राग-द्वेष-मोह रूप पर-भाव में प्रवृत्ति करना, इसीका नाम हिंसा है । हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म, अपरिग्रह (पर वस्तु में परत्व-मूर्छा परिणाम) इस प्रकार पंचपापों में प्रवृत्ति करना, यह सब आत्म-स्वभाव के घातक होने से हिंसा रूप कहे गए हैं। यह आत्मा का अधर्म है। अधर्म का त्याग कर जैन धर्म एवं आचार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210867
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarendrakumar
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size552 KB
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