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________________ जैन मुनि और वस्त्र-परम्परा २८५ ४. कोई यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं न तो दूसरों को आहार आदि लाकर दूँगा और न उनके द्वारा लाया गया आहार स्वीकार करूँगा । परिहारविशुद्धि की साधना में चलने वाला मुनि विकृष्ट तप या रोग के कारण अशक्त हो जाए तो उस समय वह साधर्मिक की अपनी प्रतिज्ञा अनुसार सेवा लेता हुआ भक्तपरिज्ञा अनशन के द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दे । भक्तपरिज्ञा अनशन में केवल आहार और कषाय का त्याग होता है । तीसरी भूमिका में साधक एक वस्त्र और एक पात्र को स्वीकार करता है। शीत ऋतु की समाप्ति पर यदि वह सक्षम हो तो अचेल हो जाता है, अन्यथा एक वस्त्र रखता है । साधना काल में किसी कारणवश साधक के शरीर में रोग उत्पन्न हो जाए तो वह दूसरों के सहाय की अपेक्षा न कर एकत्व भावना का चिन्तन करता है। ये कर्म मैंने ही किये थे और इसका परिणाम मुझे ही भोगना पड़ेगा । एगो अहमंसि न मे अस्थि कोइ न याहमवि कस्सइ एवं से एगागिणमेव अप्पाणं समभिजाणिज्जा “मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ" इस प्रकार एकत्व भावना का आलम्बन ले समभाव से रोग को सहन करता है। इस भूमिका का साधक अस्वादवृति की साधना करने के लिए आहार के कवल को दाएँ से तथा बाँ से दाँए जबड़ े में नहीं ले जाता है। रूक्ष आहार से कोई रोग उत्पन्न हो, शरीर की शक्ति शिथिल दिखाई दे और साधना के क्रियानुष्ठान में अपने को असमर्थ देखे तो वह साधक आयंबिल तप के द्वारा अपने आहार को संक्षिप्त कर देता है। फलवत् सहनशील बनकर इंदिनीमरण के लिए अपने को समर्पित कर देता है। इंगिनीमरण में भूमि को मर्यादा होती है, उससे बाहर वह आवागमन नहीं करता । चतुर्थ भूमिका के साधक गच्छ-निर्गत प्रतिमा स्वीकृत मुनि होते हैं । ये अचेल होते हैं और पात्र भी नहीं रखते । यहाँ वस्त्र के साथ पात्र का भी त्याग हो जाता है। उनकी कष्ट सहिष्णुता भी बढ़ जाती है । शीत-स्पर्श, उष्णस्पर्श, तृण-स्पर्श और डंसमंस आदि स्पर्श भी सहन करने में वे अपने को समर्थ देखते हैं । जो साधक अनुकूल और प्रतिकूल उपनगों से अपने को प्रभावित होने नहीं देता, वही इस भूमिका में साधना कर सकता है। सामान्यतः साधक निर्वस्त्र रहता है लेकिन जो लज्जा को जीतने में समर्थ नहीं होता, वह कटिबंध रखता है और उसका उपयोग शहर या गांव में मिला लाने के समय करता है प्रतिमा स्वीकृत मुनि इन चार अभिग्रहों में से एक को स्वीकार करता है। वे ये है १. मैं अशन आदि लाकर दूसरों को दूँगा और उनके द्वारा लाया गया स्वीकार भी करूँगा । २. मैं अशन आदि लाकर दूसरों को दूंगा पर उनके द्वारा लाया गया स्वीकार नहीं करूँगा । ३. मैं अशन आदि न तो लाकर दूसरों को दूंगा और न उनके द्वारा लाया गया स्वीकार करूँगा । ४. मैं अशन आदि दूसरों को लाकर नहीं दूंगा पर उनके द्वारा लाया गया स्वीकार करूँगा । Jain Education International उस समय तृणों की याचना करता है। इस भूमिका में मुनि अपने को रोग से ग्रस्त देखे तो तृणों को ले एकान्त में जाकर भूमि की प्रतिलेखना कर निर्जीव स्थान पर उन्हें बिठाता है । सिद्धों की साक्षी से पाँच महाव्रत का आरोपण करता है और चारों प्रकार के आहार का त्याग करता है। पादपोगपमन अनशन में शरीर के अंग तथा उपांग का संकोच और विस्तार नहीं होता । निषण्ण या शयन जिस अवस्था में प्रारम्भ करता है, अन्त तक उसी अवस्था में रहता है । दृष्टि संचालन आदि सब काय-योग, वचन-योग और अप्रशस्त मनोयोग का निरोध करता है । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.210835
Book TitleJain Muni aur Vastra Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechandmuni
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ritual
File Size687 KB
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