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________________ ६४४ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ जीवन प्रवृत्ति में भी निवृत्ति का जीवन है । उनके लिए बाह्य पदार्थ नहीं, यद्यपि श्वेताम्बर आगम-साहित्य की टीकाओं में आवश्यक मूर्छा ही वास्तविक परिग्रह है। चूंकि यह बात श्वेताम्बर परम्परा के नियुक्ति, आवश्यकभाष्य, विशेषावश्यक भाष्य, आवश्यक चूर्णि, निशीथ अनुकूल थी अत: उसे भरत का जीवनादर्श अधिक अनुकूल लगा। चूर्णि, कल्पसूत्रवृत्ति, आचारांग टीका और स्थानांग टीका में बाहुबलि यही कारण था कि श्वेताम्बर आचार्यों ने भरत के जीवन चरित्र पर अपनी का जीवनवृत्त उल्लिखित है। कथा-साहित्य में विमलसरि के एउमचरिउ कलम को अधिक चलाया है। में, संघदासगणि कृत वसुदेवहिण्डि में, शीलांक के चउपन्न महापुरिश्चरियं इसके विपरीत बाहुबलि की जीवन-दृष्टि भिन्न है, वे पूरे मन से में एवं हेमचन्द्र के त्रिषष्टिशलाका पुरुष-चरित्र में भी बाहुबलि का राजा हैं । राजा का गौरव उनके मन में है, यही कारण है कि वे बड़े भाई जीवनवृत्त सविस्तार से उल्लिखित है। इसके अतिरिक्त भरत चक्रवर्ती की अधीनता के प्रस्ताव को ठुकराकर युद्ध के लिये तैयार हो जाते हैं पर लिखे गये भरतेश्वर बाहुबलि वृत्ति में तथा शत्रुजयमाहात्म्य आदि और बड़े भाई का राजलिप्सा के मद में युद्ध की नैतिकता को भंग कर ग्रन्थों में बाहुबलि के सम्बन्ध में उल्लेख प्राप्त है । जिनरत्न कोश के छोटे भाई के वध के लिए उद्यत हो जाना ही उनके विराग का कारण अनुसार बाहुबलि पर दो स्वतन्त्र ग्रंथ 'बाहुबलि चरित्र' के नाम से भी बन जाता है । वे श्रमण बन जाते हैं, फिर भी उनके मन से 'राजा का प्राप्त हैं, जिनमें एक के लेखक भट्टारक चारुकीर्ति हैं जो कि दिगम्बर गौरव' समाप्त नहीं होता है । भरत की भूमि पर खड़े रहने या छोटे परंपरा के हैं। दूसरे के लेखक अज्ञात हैं, जो कि संभवतः श्वेताम्बर भाइयों के नमन करने के प्रश्न उनके मन को कचोटते रहते हैं । यद्यपि परम्परा के हो सकते हैं । श्वेताम्बर परम्परा में पुण्यकुशलगणि की भरत बाहुबलि ने युद्ध भी जीता है और अपना गौरव भी अक्षुण्ण रखा, फिर बाहुबलि महाकाव्य नामक एक अत्यन्त सुन्दर तथा महत्त्वपूर्ण कृति है, भी भीतर के युद्ध में उन्हें सहज विजय नहीं मिलती है । उनका जीवन यह संस्कृत भाषा में है । इसके अतिरिक्त शालिभद्रसूरि का भरतकठोर निवृत्ति प्रधान साधना का जीवन है । ध्यान और कायोत्सर्ग की बाहुबलि रास (१३वीं शताब्दी) एवं अमीऋषिजी का भरत बाहुबलि साधना का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देख पाना कठिन है । जिसके चौखलिया, समकालीन आचार्य तुलसी का भरतमुक्ति काव्य क्रमश: शरीर को लताओं ने आच्छादित कर लिया हो, चींटियों ने जिस पर प्राचीन गुजराती, राजस्थानी एवं हिन्दी में श्वेताम्बर आचार्यों की प्रमुख अपने वल्मीक बना लिये हों, फिर भी जो ध्यान में अचल और अकम्प रचनाएँ हैं, जिनमें बाहुबलि का जीवनवृत्त उल्लिखित है । है, कितनी कठोर साधना है । बाहुबलि का जीवन निवृत्तिपरक कठोरतम दिगम्बर परम्परा के आगम-स्थानीय साहित्य में कुन्दकुन्द के साधना का उच्चतम आदर्श है । यही कारण था कि कठोर साधना के भाव पाहुड़ में बाहुबलि को मान कषाय था, मात्र इतना उल्लेख है । आदर्श के प्रति श्रद्धान्वित दिगम्बर परम्परा में बाहुबलि के प्रति अपेक्षाकृत इसके अतिरिक्त दिगम्बर परम्परा के आगमिक साहित्य में बाहुबलि के अधिक बहुमान देखा जाता है । किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जीवनवृत्त का उल्लेख हमें प्राप्त नहीं हुआ है, यद्यपि दिगम्बर परम्परा श्वेताम्बर परम्परा में बाहुबलि के प्रति या दिगम्बर परम्परा में भरत के का पौराणिक साहित्य विस्तार से बाहुबलि की यशोगाथा गाता है । प्रति आदर-भाव नहीं रहा है । यह तो मात्र अपेक्षाकृत विशेष रुझान की हरिषेण के पद्मपुराण, स्वयम्भू के पउमचरिउ, जिनसेन के आदिपुराण, बात है । वैसे तो दोनों परम्पराओं में दोनों के ही प्रति समादर भाव है। रविषेण के पद्मपुराण, पुन्नाटसंघीय जिनसेन के हरिवंश पुराण आदि में फिर भी हमें इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि दोनों की साधना बाहुबलि का जीवनवृत्त वर्णित है। पद्धति भिन्न-भिन्न है। यदि शास्त्रीय भाषा में कहना हो तो जहाँ भरत निश्चय प्रधान साधना के प्रतीक हैं वहीं बाहुबलि व्यवहार प्रधान साधना बाहुबलि की कथा, समानता और अन्तर के प्रतीक हैं । भरत की साधना की यात्रा निश्चय से व्यवहार की ओर बाहुबलि के जीवनवृत्त में जिन उल्लेखनीय प्रसंगों का चित्रण है, तो बाहुबलि की साधना की यात्रा व्यवहार से निश्चय की ओर है। श्वेताम्बर आचार्यों ने किया है, वे दो हैं - एक भरत और बाहुबलि के युद्ध का प्रसंग और दूसरा बाहुबलि की साधना और कैवल्य लाभ का जैन साहित्य में बाहुबलि की कथा का विकास प्रसंग। भरत ने दूत के द्वारा अपने भाइयों को अपनी अधीनता को श्वेताम्बर परम्पर। के आगमग्रंथों में स्थानांगसूत्र में बाहुबलि के स्वीकार करने का सन्देश भेजा । शेष भाई भरत के इस अन्याय के शरीर की ऊँचाई के सम्बन्ध में तथा समवायांग में बाहुबलि की आयुष्य सम्बन्ध में योग्य निर्णय प्राप्त करने पिता ऋषभदेव के पास पहुँचते हैं के सम्बन्ध में उल्लेख अवश्य उपलब्ध हैं, किन्तु वे उनके जीवनवृत्त के और अन्त में उनके उपदेश को सुनकर प्रबुद्ध हो, दीक्षित हो जाते हैं। सम्बन्ध में कोई विस्तृत जानकारी प्रदान नहीं करते हैं । जम्बूद्वीप किन्तु बाहुबलि स्पष्टरूप से भरत को चुनौती देकर युद्ध के लिए तत्पर प्रज्ञप्ति में भरत की षट्खण्ड विजय यात्रा का विस्तार से वर्णन है तथा हो जाते हैं । बाहुबलि ने भरत के सुवेग नामक दूत को जो तर्क, कल्पूसत्र में ऋषभदेव का जीवन चरित्र दिया गया है, किन्तु उनमें प्रत्युत्तर दिये हैं, वे बहुत ही सचोट, युक्तिसंगत एवं महत्वपूर्ण हैं । इस बाहुबलि के जीवनवृत्त के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है । इस सम्बन्ध में आवश्यकचूर्णि, चउपन्न महापुरिस-यरियं तथा प्रकार श्वेताम्बर परम्परा का सम्पूर्ण आगम-साहित्य बाहुबलि के जीवनवृत्त त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र के प्रसंग निश्चय ही पठनीय हैं। वह कह उठता के सम्बन्ध में मौन है। है, क्या भाई भरत की भूख अभी शांत नहीं हुई है ? अपने लघुभ्राताओं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210810
Book TitleJain Parampara me Bahubali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size615 KB
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