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________________ (ख) फ्लैट - अर्थ सोसाइटी व अन्य संस्थाएं : (२) दूसरे पक्ष की ओर से समाधान यह प्रस्तुत किया जाता है कि विज्ञान की मान्यता अंतिम रूप तो मानी नहीं जा सकती । विज्ञान तो एक अनवरत अनुसन्धान प्रक्रिया का नाम है ।' विज्ञान के अनेक प्राचीन सिद्धान्त आज स्वयं विज्ञान द्वारा खंडित हो गए हैं। पृथ्वी के नारंगी की तरह गोल होने की मान्यता पर भी कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों का वैमत्य है। अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों से पृथ्वी के नारंगी की तरह गोल होने की मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगा है । लन्दन में फ्लैट अर्थ सोसाइटी' नामक संस्था कार्य कर रही है। जो पृथ्वी को चिपटी सिद्ध कर रही हैं। भारत में भी पू० १०५ आर्थिका ज्ञानमती माता जी के निर्देशन में दिग० जैन त्रिलोक शोध संस्थान (हस्तिनापुर, मेरठ-उ०प्र०), तथा पू०पं० प्रवर मुनि श्री अभयसागर जी गणी म० की प्रेरणा से कार्यरत 'भू-भ्रमण शोध संस्थान' (The Earth Rotation Research Institute ) ( मेहसाना, उ० गुजरात) आदि संस्थाएं इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं । पूज्य पं० प्रवर मुनि श्री अभयसागर जी गणि के प्रयत्नों से विविध साहित्य का निर्माण हुआ है जिसमें पृथ्वी के विज्ञानसम्मत आकार के विरुद्ध, वैज्ञानिक रीति से ही प्रश्न व आपत्तियां उठाई गई हैं, और जैनसम्मत सिद्धान्त के प्रति सम्भावित दोषों का निराकरण भी किया गया है।' (८) पृथ्वी की स्थिरता इसी तरह, जैनागम-परम्परा में पृथ्वी को स्थिर माना गया है, न कि भ्रमण-शील । वेद आदि प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में भी पृथ्वी को स्थिर कहा गया है।" भारत के प्रसिद्ध प्राचीन आचायों में श्री वराहमिहिर ( ई० २०५) श्रीपति ( ई० १६६ ) आदि के नाम इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है जिन्होंने पृथ्वी की स्थिरता का सयुक्तिक प्रतिपादन किया है। प्राचीन जैनाचार्य श्री विद्यानन्द स्वामी (०) ने स्वार्थश्लोकवातिक' में भू-भ्रमण के सिद्धान्त को सयुक्तिक खण्डित किया है। आज भी अनेक मनीषी इस सम्बन्ध में अन्वेषण कर रहे हैं। आधुनिक विज्ञान इस पृथ्वी को भ्रमणशील मानता है। विज्ञान और जैन मत के बीच इस खाई को वैज्ञानिक सापेक्षवाद तथा जैन अनेकान्तवाद या स्याद्वाद के माध्यम से पाटा जा सकता है । 1. 2. ३. ४. ७. ८. "Science is a series of approximations to the truth; at no stage do we claim to have reached finality; any theory is liable to revision in the light of new facts.” (A. W. Barton, quoted in 'Cosmology : Old and New', Prologue, p. III ). "Scientific theories arise, develop and perish. They have their span of life, with its successes and triumphs, only to give way later to new ideas and a new outlook." (Leopold Infeld in "The world in Modern Science", p. 231). See: Research-article 'A Criticism upon Modern Views of Our Earth' by Sri Gyan Chand Jain (appeared in Ft. Sri Kailash Chandra Shastri Felicitation Volume, pp. 446-450), द्र० (१) पृथ्वी का आकार निर्णय एक समस्या, (२) क्या पृथ्वी का आकार गोल है ? (३) भूगोल विज्ञान-समीक्षा । [ प्रकाशकजंबूद्वीप निर्माण योजना, पज, गुज०)) (४) विज्ञानवादविमर्श (प्रका० भू-मण शोध संस्थान, महेसाणा, गुज०) (क) सूर्य की भ्रमणशीलता का उल्लेख जैन शास्त्रों में प्राप्त है- सूर्यप्रज्ञप्ति १२६ १०, भगवती सूत्र- वृत्ति - ५१1१-२, (ख) किन्तु धवला ग्रन्थ ( दिग० ) में आचार्य वीरसेन ने पृथ्वी की मननीय है : भ्रमणशीलता का भी संकेत किया है, जो वस्तुतः 1 द्रव्येन्द्रियप्रमितजीवप्र देशानां न भ्रमणमिति किन्नेष्यते इति चेन्न दर्शनाला १११.१.२३ तसिद्धान्त कोश ध्रुवा पृथिवी ( पातंजल योग सू० २२५ पर व्यास भाष्य ) । PIORIR) I द्र० विज्ञानवाद-विमर्श (भूभ्रमण शोध संस्थान, महेसाणा गुज०), पृ० नगराज) १०१, ० श्लोक -५ (०सू० ३/१३ परलोक ० १२-१४, पृ० ५५-८५) ० या पृथिवीस्विर है' (ले० आ० जिनमगिसागररि), जैन धर्म एवं आचार Jain Education International तद्-भ्रमणमन्तरेण आशुभ्र मज्जीवानां भ्रमद्भूम्यादि२१३३९-४० पृष्ठ ) । ध्रुवासि धरणी (यजुर्वेद - २१५ ) । पृथिवी वितस्थे (ऋ० १३ जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान (ले० मुनि For Private & Personal Use Only १३६ www.jainelibrary.org
SR No.210789
Book TitleJain Dharmshastro aur Adhunik Vigyan ke Alok me Pruthvi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDamodar Shastri
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages24
LanguageHindi
ClassificationArticle & Geography
File Size2 MB
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