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________________ 3. किसा आचारनियम फलित होते हैं1. किसी निर्दोष प्राणी को बन्दी मत बनाओ अर्थात् सामान्यजनों की स्वतन्त्रता में बाधक मत बनो। 2. किसी का वध या अंगच्छेद मत करो, किसी से भी मर्यादा से अधिक काम मत लो, किसी पर शक्ति से अधिक बोझ मत लादो। किसी की आजीविका में बाधक मत बनो। 4. पारस्परिक विश्वास को भंग मत करो। न तो किसी की अमानत हड़प जाओ और न किसी के गुप्त रहस्य को प्रकट करो। सामाजिक जीवन में गलत सलाह मत दो, अफवाहें मत फैलाओ और दूसरों के चरित्र-हनन का प्रयास मत करो। 6. अपने स्वार्थ की सिद्धि-हेतु असत्य घोषणा मत करो। 7. न तो स्वयं चोरी करो, न चोर को सहयोग दो और न चोरी का माल खरीदो। 8. व्यवसाय के क्षेत्र में नाप-तौल में प्रामाणिकता रखो और वस्तुओं में मिलावट मत करो। 9. राजकीय नियमों का उल्लंघन और राज्य के करों का अपवंचन मत करो। 10. अपने यौन सम्बन्धों में अनैतिक आचरण मत करो। वेश्या-संसर्ग, वेश्या-वृत्ति एवं उसके द्वारा धन का अर्जन मत करो। 11. अपनी सम्पत्ति का परिसीमन करो और उसे लोक हितार्थ व्यय __ करो। 26. आय के अनुसार व्यय करो। 27. अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार वस्त्र पहनो। 28. धर्म के साथ अर्थ-पुरुषार्थ और मोक्ष-पुरुषार्थ का इस प्रकार सेवन करो कि कोई किसी का बाधक न हो। 29. अतिथि और साधुजनों का यथायोग्य सत्कार करो। 30. कभी दुराग्रह के वशीभूत न होओ। 31. देश और काल के प्रतिकूल आचरण न करो। 32. जिनके पालन-पोषण करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर हो, उनका पालन-पोषण करो। 33. अपने प्रति किये हुए उपकार को नम्रता पूर्वक स्वीकार करो। 34. अपने सदाचार एवं सेवा-कार्य के द्वारा जनता का प्रेम सम्पादित करो। 35. परोपकार करने में उद्यत रहो। दूसरों की सेवा करने का अवसर आने पर पीछे मत हटो। निदेशक, पूज्य सोहनलाल स्मारक पार्श्वनाथ शोधपीठ, वाराणसी-5 सन्दर्भ-ग्रन्थ ऋग्वेद, 10/19/12 2. ईशावास्योपनिषद्, 6 3. वही, / श्रीमद्भागवत 7/14/8 आचारांग, 1/5/5 प्रश्नव्याकरणसूत्र, 2/1/2 वही, 2/1/3 8. समन्तभद्र, युक्त्यानुशासन 61 9. स्थानांग, 10/760 10. देखें - सागरमल जैन, व्यक्ति और समाज, श्रमण 11. देखें - प्रबन्धकोश, भद्रबाहु कथानक 12. उद्धृत (क) रतनलाल दोशी, आत्मसाधना संग्रह, पृ. 441 (ख) भगवतीआराधना, भाग 1, पृ. 197 13. Bradle, Ethical Studies 14. मुनि नथमल, नैतिकता का गुरुत्वाकर्षण, पृ. 3-4 15. उमास्वाति, तत्वार्थसूत्र, 5.21 16. उत्तराध्ययनसूत्र, 25.19 17. आचारांग, 1.2.3.75 18. सागरमल जैन, सागर जैन-विद्या भारती, भाग 1, पृ. 153 19. जटासिंहनन्दि, वरांगचरित, सर्ग 25, श्लोक 33-43 20. आचारांगनियुक्ति, 19 21. आवश्यकचूर्णि, भाग / पृ. 152 22. जिन सन, आदि पुराण 11/166-167 23. अन्तकृतदशांग 3/1/3 24. उपासकदशांग, 1/48 25. वही, 1/48 26. वही, 1/48 27. ज्ञाताधर्मकथा, 8 (मल्लिअध्ययन) 16 (द्रौपदी अध्ययन) 28. अन्तकृतदशा, 5/1/21 29. स्थानांग, 10.760 विशेष विवेचन के लिये देखें -- धर्मव्याख्या, पू0 जवाहरलालजी म. और धर्म-दर्शन, पं. मुनि श्री शुक्लचन्द्रजी म. 30. धर्मदर्शन, पृ. 86 31. दशवैकालिकनियुक्ति, 158 32. नन्दीसूत्र -- पीठिका, 4-17 12. अपने व्यवसाय के क्षेत्र को सीमित करो और वर्जित व्यवसाय मत करो। 13. अपनी उपभोग सामग्री की मर्यादा करो और उसका अति संग्रह मत करो। 14. वे सभी कार्य मत करो, जिससे तुम्हारा कोई हित नहीं होता है। 15. यथा सम्भव अतिथियों की, सन्तजनों की, पीड़ित एवं असहाय व्यक्तियों की सेवा करो। अन्न, वस्त्र, आवास, औषधि आदि के द्वारा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करो। 16. क्रोध मत करो, सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करो। 17. दूसरों की अवमानना मत करो, विनीत बनो, दूसरों का आदर-सम्मान करो। 18. कपटपूर्ण व्यवहार मत करो। दूसरों के प्रति व्यवहार में निश्छल एवं प्रामाणिक रहो। 19. तृष्णा मत रखो, आसक्ति मत बढ़ाओ। संग्रह मत करो। 20. न्याय-नीति से धन उपार्जन करो। 21. शिष्ट पुरुषों के आचार की प्रशंसा करो। 22. प्रसिद्ध देशाचार का पालन करो। 23. सदाचारी पुरुषों की संगति करो। 24. माता-पिता की सेवा-भक्ति करो। 25. रगड़े-झगड़े और बखेड़े पैदा करने वाली जगह से दूर रहो, अर्थात् चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले स्थान में न रहो। 6. हीरक जयन्ती स्मारिका विद्वत् खण्ड /88 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210780
Book TitleJain Dharm me Samajik Chintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Hirak_Jayanti_Granth_012029.pdf
Publication Year1994
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Society
File Size969 KB
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